सोमवार, 2 मई 2016

Zona - 02.2



कई सालों से आलू ही स्थानीय लोगों की कमाई का प्रमुख साधन था. बर्फ़ जमने से पहले नदी से बजरे गुज़रते और आलू ख़रीद लेते. फ़िलहाल, मेर्ज़्ल्याकोव के खलिहान में ठण्ड और गर्माहट से बचाने के लिए तिरपाल और जूट से ढंके पैंतीस बोरे तैयार पड़े थे. अगर भाव पिछले साल वाला ही रहा, तो ये बनते हैं क़रीब पचास हज़ार रूबल्स...पहले तो गाजर, मूली, पत्ता गोभी भी ख़रीदते थे, मगर फिर न जाने क्यों बन्द कर दिया...क्रैनबेरीज़ भी बेची जा सकती हैं, बेशक, अख़रोट भी. मशरूम्स. ब्ल्यूबेरीज़... जानवरों की खालें...उनका इलाका बहुत दयालु है, किसी को भूखे नहीं मरने देगा. थोड़ा हाथ-पैर हिलाओ – और खाने-पीने का इंतज़ाम हो जाता है, नोटों की छोटी सी गड्डी मिलने की संभावना उत्पन्न हो जाती है.
ज़मीन पतली परत वाली थी, क़रीब पाँच से सात सेंटीमीटर्स, और उसके नीचे बस रेत ही रेत थी, सिर्फ जड़ों के चारों ओर काली मिट्टी के कुछ ढेर बन गए थे, मानो जड़ों ने ख़ुद ही हल्के भूरे भूमिगत रेगिस्तान में पोषक ढेलों को धकेला हों.
रेत की पर्त क़रीब डेढ़ मीटर नीचे तक थी, फिर विरले पाए जाने वाले बहुमूल्य पत्थरों वाली नम, चिकनी मिट्टी शुरू हो रही थी.
 “यहीं से चीड़ के पेड़ों को ख़ुराक मिलती है,” अंकल वीत्या ने कहा, ये देखकर कि कोल्या क्रिकाऊ दिलचस्पी से अपने फ़ावड़े से निकाली गई चीज़ को ऊँगलियों से मसल कर देख रहा है.
 “बिल्कुल तेल जैसा है...और कंकड़ – जैसे नदी में मिलते हैं...यहाँ क्या, पहले नदी का तल था?”
 “ऐसा ही लगता है.”
 “हे-हे,” ब्र्युखानोव हँस पड़ा, “पहले हर तरफ़ नदी का तल था. ‘एनिमल प्लेनेट’ चैनल तुम्हारे यहाँ आता है?”
 “हुम्, हाँ...मगर टी.वी. चैनल एक बात है, और दूसरी – जैसे ये...पहाड़, नदी ये रही यहाँ...मगर – तल.”      
 “महान जल-प्रलय के निशान,” ट्रैक्टर ड्राइवर गेन्नादी ने, जो बेहद आलसी था, या सही कहें तो जिसे अपने हाथों से काम करना पसन्द नहीं था, दार्शनिक अंदाज़ में कहा. और इस समय भी वह जड़ें तोड़ने के लिए सिर्फ फ़ावड़ा लेकर आया था, मगर सामने वाली जड़ों को दूसरे आदमी के लिए छोड़कर उसे अभी तक चलाया भी नहीं था. जल प्रलय की याद दिलाना प्रासंगिक ही था, सब ने सम्मानपूर्वक गर्दन हिला दी. सब लोग चुप हो गए, ज़ाहिर है, उस वक़्त की कल्पना करने की कोशिश करते हुए जब समूची धरती, या उसका एक बड़ा हिस्सा पानी के नीचे था...मगर गेन्नादी ने ही अपनी इस टिप्पणी से उत्पन्न सम्मानजनक ख़ामोशी को ये कहते हुए तोड़ा:
 “और, चीड़ के पेड़ों को यहाँ से ख़ुराक मिलती है, ये मुश्किल ही लगता है.”
 “क्यों?”
“उनकी जड़ें कमज़ोर होती हैं. देखो, ये ज़मीन पे पड़ी रहती हैं, मकड़ी के पंजों की तरह.”
 “ये दूसरी जड़े हैं,” अंकल वीत्या ने कहा, “सहारे के लिए. और पानी और भोजन दूसरी जड़ें सोखती हैं.”
 “कौन सी?”
अंकल वीत्या ने, समझाने के लिए अपने आप को तैयार करते हुए, गहरी साँस ली.
“ क्या कभी मुड़े हुए चीड़ देखे हैं?”
 “वो कहाँ से देखेगा?” झेन्का ग्लूखिख ठहाका मारते हुए हँसने लगा. “उसे बेल्ट से ट्रैक्टर से बांध दो, वो झटका लगाता है और चल पड़ता है!”
 “नहीं, देखा है, देखा है,” त्यौरियाँ चढ़ाते हुए गेन्नादी ने बात काटी.  “तो क्या?”
“वहाँ, नीचे है, तने के नीचे, पूँछ जैसी, मगर छोटी सी. ऐसी – तिकोने जैसी. जैसे नोकदार कील होती है.”
 “हुँ.”
 “उसमें से पतली पतली जड़ें निकलती हैं धमनियों जैसी. वो गहराई तक जाती हैं. इसलिए चीड़ों को रेत पर बढ़ना अच्छा लगता है – गर्माहट भी रहती है, और जड़ें भी गहराई में होती हैं...”
 “भाषण देना अच्छा लगता है. हाथ दो,” बूढ़े मेर्ज़्ल्याकोव के छोटे बेटे दिमित्री मेर्ज़्ल्याकोव ने गढ़े से पुकारा, जो ख़ुद भी बस दादा होने ही वाला था – बेटी ने पिछले साल नौ क्लास पास कर लिए थे और क्रास्नोयार्स्क चली गई थी, वहाँ कॉलेज में दाख़िला ले लिया, और इन गर्मियों में, जब छुट्टियों में आई थी, तो बता दिया कि उसे एक नौजवान मिल गया है, और उसने शादी का प्रस्ताव भी रखा है.
 “क्या, तेरे बदले मैं आऊँ?” ब्र्युखानोव ने फ़ावड़ा उठाया.
 “आ जा. वहाँ ठण्ड है, स्वेटर के भीतर से भी ठण्ड घुस रही थी.”
सारे मर्द हँसने लगे:
 “मेर्ज़्ल्याक3  है ही ठिठुरने वाला...”
अंकल वीत्या ने क़ब्र में झाँका :
 “बस, काफ़ी है. दो मीटर के क़रीब है...तली को समतल कर दे और – सब ठीक है. हमारे पास और भी काम है.” – और उसने कैनवास के एक बदरंग बैग से, जिसे मछलियाँ पकड़ने के लिए साथ में ले जाते हैं, वोद्का की बोतल निकाली.
 “ऐह, अंकल वीत्या, तू तो हमारा!...” ग्लूखिख जोश से चिल्लाया, मगर अंकल वीत्या ‘हमारा’ कौन है, ये बताने के लिए शब्द नहीं ढूँढ़ पाया, बस चुटकी बजा दी.
 “अरे, वो अकेला ही नहीं,” मेर्ज़्ल्याकोव ने स्वेटर के नीचे कहीं से एक चपटा फ्लास्क निकाला. – “केद्रोव्का!”
गेन्नादी ने आह भरी:
 “तुम भी ना, यारों, अपने आपको बेवकूफ़ समझने पर मजबूर करते हो. ख़ुद तो ले आए, और हम, मुफ़्तख़ोरों की तरह...इस बारे में सोचा ही नहीं.”  
 “कोई बात नहीं, ये काफ़ी है. हम नशा थोड़े ही कर रहे हैं. बस, उनकी याद में...”
लेशा ब्र्युखानोव को बाहर आने में मदद की गई, औज़ार से चिपकी हुई मिट्टी साफ़ कर दी गई, गड्ढे से थोड़ी दूर एक समतल जगह मिल गई. घेरा बना कर बैठ गए. अंकल वीत्या के थैले में स्टील के तीन ग्लास मिल गए, कुछ छोटी-छोटी, पिचकी हुई नमकीन ककड़ियाँ, आधी डबल रोटी, चर्बी के क्यूब्स... सब उसके और मेर्ज़्ल्याकोव के आभारी थे कि समय से पहले अपनी बोतल नहीं निकाली. और अब, काम पूरा होने के बाद, हल्की सी थकावट महसूस करते हुए घूँट-घूँट करके सौ ग्राम्स पीना, खाना, बतियाना...
 “किससे शुरू करें?” झेन्का ग्लूखिख ने हाथ मलते हुए पूछा.
 “बेहतर है ‘नीट’ से. केद्रोवा – बाद में – स्वीट डिश की तरह.”
 “डा--लो!”
ग्लासों में वोद्का डालते हुए कुछ परेशानी हुई.
सही कहें तो, एक अनिवार्य बहस हुई:
 “नीचे रख, पेंदे से न पकड़.”
 “कैसे रखूँ? लुढ़क जाएगा.”
 “नीचे रख और पकड़. पेंदे से पकड़ के कभी नहीं डालना चाहिए.”
 “अफ़ानासी इवानिच, तू तो अभी बुढ़ाया नहीं है, मगर तेरे लक्षण कैसे हैं...”
 “वोद्का के साथ इज़्ज़त से पेश आना चाहिए – ये कोई बहता हुआ पानी थोड़े ही है. ये हमें सज़ा भी दे सकती है.” “
 “ये सही है,” अंकल वीत्या ने गहरी साँस ली, “ये बिल्कुल सही है. कित्तों को इसने यहाँ सुला दिया...सिर्फ, मेरी बात सुनो, पीने के बाद गाँव में छुपते न फ़िरना, जिससे ढूँढ़ने की नौबत आए. ठीक है? कल शाम को तो होगा ही, मगर आज – ऐसा नहीं करेंगे.”
जवाब में कुछ आहत सुर में चिल्लाए – जैसे, पता है; हम कोई शराबी थोड़े ही हैं, जिसे बताने की ज़रूरत हो...ग्लूखिख ने व्यंग्य से ऐसा ही कहा:
 “पता है, टीचर कहीं का, - ये बात भी पढ़ानी पड़ती है.”
 “झेन्क, अगर मैं सचमुच का टीचर होता, तो मैं तुझे ऐसा चाँटा मारता, कि महीना भर पेट में अपनी ज़बान ढूँढ़ता रहता.”
 “तूने मारा ही था मुझे.”
 “तेरी तो, गोल आरी में ऊँग़लियाँ घुसेड़ना चाहिए!”
 “वैसे, अंकल वीत्या, स्कूल का क्या?” ब्र्युखानोव ने पूछा. “मेरी नास्त्का कहती है कि इस साल ज्योग्राफ़ी  और केमिस्ट्री के टीचर्स नहीं हैं. वैसे, कहती है, कि कभी भी बन्द कर सकते हैं. लाइब्रेरी में आधी किताबें बांध के रखी हैं – देते नहीं हैं.”
 “हूँ, कभी भी नहीं. आख़िर तक पढ़ाते रहेंगे. और टीचर्स – भाग गए.”
  “हाँ-आ...” ब्र्युखानोव ने गिलास उठाया. “तो, नतालिया सेर्गेयेव्ना की याद में पिएँ. अच्छी थी, ख़तरनाक नहीं थी...”
 “हो सकता है, वो बिल्कुल सही समय पर चली गई,” मेर्ज़्ल्याकोव ने टिप्पणी की.
अफ़ानासी इवानोविच ने अपनी सफ़ेद भौंहे उठाईं, जिन पर पसीना छलक आया था:
 “मतलब?”
 “यहीं पड़ी रहेगी, मातृभूमि में...”-
 “वो कुताय की है – राजधानी वाली,” मर्दों में से सबसे बूढ़े, ख़ामोश-तबियत, इग्नाती अन्द्रेयेविच उलाएव ने कहा. उसकी त्यौरियाँ हमेशा चढ़ी रहती थीं, मगर वो मेहनती और मितव्ययी था. उसे पीठ के पीछे सब लोग ‘हथौड़ा’ कहते थे: हमेशा फ़ेन्सिंग में कुछ न कुछ सुधारता ही रहता था, हथौड़े से ठोंकता रहता, ठोंकता रहता, दुकान से बैग्स भर-भरके कीलें घसीटा करता था.
 “क्या फ़रक पड़ता है... धरती तो एक ही है. मगर, हमें न जाने क़िस्मत कहाँ ले जाए...”
सबको अटपटा, असहज महसूस हुआ. एक दूसरे की ओर नहीं देख रहे थे – कोई क़ब्रों की ओर, कोई चीड़ों के चटख़-भूरे तनों की ओर, कोई नीचे, काँटों की ओर, जिन पर आलसी, उनींदी चींटियाँ रेंग रही थीं. .. मेर्ज़्ल्याकोव के शब्दों ने कभी सुनाए गए हुक्म के भय से रूह का संरक्षण करने वाला कवच उतार फेंका: “ज़रूरी सामान इकट्ठा कर लो! एक हफ़्ते बाद गाड़ी आएगी. जो हुक्म नहीं मानेगा – उसे बल प्रयोग से भगा दिया जाएगा”.                
यहाँ बैठे लोगों में से किसी ने अभी तक ऐसी कोई घोषणाएँ नहीं सुनी थीं, मगर ज़्यादातर के बाप-दादाओं और परदादाओं ने – सुनी थीं. किसी ने स्तलीपिन के ज़माने में, किसी ने स्टालिन के ज़माने में. और उन्हें यक़ीन था कि देर-सबेर उनके लिए भी ऐसी घोषणाएँ की जाएँगी.
तीस साल पहले हुई तो थी. मगर आख़िरी पल में हुक्म देने वाले की आवाज़ टूट गई. उनके गाँव की दो और पीढ़ियों ने जन्म लिया: कोल्या क्रिकाऊ की पीढ़ी और उन लोगों की पीढ़ी, जो आजकल स्कूल में आधे टीचर्स के बिना पढ़ाई कर रहे हैं, स्थानांतरित होने के तैयार स्कूल के सामान को बक्सों और डिब्बों में समेटा हुआ देख रहे हैं. स्थानांतरण वाली घोषणा का सभी लोग इंतज़ार कर रहे थे, और अगर उन्होंने अब तक अपना सामान समेटा नहीं है, तो ये ज़रूर तय कर लिया है कि क्या साथ में ले जाना है, और क्या फेंकना है. हर रोज़ इसी ख़याल से दुखी होते थे, मगर चुपचाप, बग़ैर बहस किए. सुबह आँगन में निकलते, चारों ओर नज़र दौड़ाते, दिमाग़ घूमने लगता: क्या ले जाएँ? कैसे चुनें? छत के नीचे खड़े होकर कोई व्यवस्था करने का निश्चय करते हो, और सिर घूमने लगता है – इत्ती सारी ज़रूरत की, मगर अब बेकार हो चुकी, परेशान करने वाली चीज़ें हैं. फेंकने में दुख होता है, और इस पर्याप्तता में, उस सबमें जो बाप-दादाओं ने कोठरियों में, खत्तियों में, टॉवर्स में जमा करके रखा है, जैसे डूब जाओगे...
थूक देते, न सोचने की कोशिश करते. मगर यदि कोई स्थानांतरण के बारे में एक लब्ज़ भी निकालता, तो डर उछल कर बाहर आ जाता, बढ़ता जाता, अपनी लपेट में ले लेता...
पहले उनमें से तीन ने वोद्का पी ली. लालची न दिखाई देने के डर से, झेंपते हुए धीरे-धीरे, खाते रहे. इसके बाद और तीन ने ख़त्म की. फिर - दो ने.
वे ख़ामोश थे, महसूस कर रहे थे कि पेट में गिरकर वोद्का जिस्म में कैसे दौड़ने लगती है - गरम-गरम चिंगारियों जैसी. साँस लेना आसान हो गया था, ख़ून में ताज़गी दौड़ गई...ये पहुँची चिनगारियाँ सिर तक, भड़कीं, वहाँ, दिमाग़ में मौजूद किसी महत्वपूर्ण चीज़ को प्रकाशित करते हुए, और बुझ गईं. और कुछ पलों तक चलने वाला नशा नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के, अपने जिस्म के तीव्र एहसास की एक अजीब सी हालत ग़ायब हो गई. ख़ून फिर से धीरे-धीरे और तनाव से बहने लगा, सीना फिर से निकोटिन की नमी से भर गया, दिमाग़ की कोई महत्वपूर्ण चीज़ सांझ के झुरमुटे में छुप गई, और दुबारा पीने को – अपने भीतर एक और पैग डाल लेने को जी चाहने लगा.
मगर किसी ने भी बोतल की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया – उन्हें मालूम था कि इसके लिए ये समय उचित नहीं है: अगर ‘पहले और दूसरे...’ के बीच मन मर्ज़ी करने लगो, तो फिर बहक जाओगे और बड़ी देर तक रुक न पाओगे, वोद्का की मिन्नत कर-करके, माँग कर-करके आस पास के लोगों को भी परेशान करोगे, और ख़ुद भी बेज़ार हो जाओगे. वे सिगरेट के कश लगाते रहे, इंतज़ार करते रहे, कि पहले कौन बोलेगा. ‘पहला’ बनने की इच्छा नहीं हो रही थी, मगर ख़ामोश रहना भी बोझिल लग रहा था.
 “प्रकृति का कोई नियम है,” झेन्का ग्लूख़िख़ ने कहा. “मैंने ग़ौर किया है...”
 “अरे, मैंने भी ग़ौर किया है,” मुस्कुराते हुए ब्र्युखानोव ने उसकी बात काटी.  “गर्मियों के बाद – पतझड़, पतझड़ के बाद – सर्दियाँ.”
 “ज़रा ठहर, मैं उस बारे में नहीं कह रहा हूँ! मैंने ग़ौर किया है कि, स्वयम् प्रकृति ही इन्सान को मृत्यु के लिए तैयार करती है...”
अफ़ानासी इवानोविच ने, जो अभी तक इस ख़याल से दूर नहीं हुआ था, कि नतालिया सेर्गेयेव्ना सही समय पर चली गई, फिर से त्यौरी चढ़ा ली:
 “किस लिहाज़ से – तैयार करती है?”
 “अच्छा, याद है...तुझे, अफ़ोन, अंकल वीत्या, इग्नात, याद है, कि नाता आण्टी कैसी ऊँची, हट्टी कट्टी थी. है ना?”
 “तो. फिर क्या?”
 “और वो कितनी दुबली हो गई, पूरी की पूरी सिकुड़ गई. वैसे बीमार तो नहीं थी, मगर कैसे... मुश्किल से ही कभी भूखी रही होगी...ये प्रकृति ही उसे तैयार कर रही थी, जिससे कि आसानी से ताबूत में समा सके.”
कुछ लोग अविश्वास से खँखारे, बाकी के मुस्कुराए. सिर्फ अंकल वीत्या ने सिर हिलाया:
 “हाँ, सही है, सही है...”
 “और कई बूढ़े, जैसे – पिघलते हैं, सूखने लगते हैं...”
 “अफ़सोस है, कि अपने पलंग पे नहीं मरी,” सूखी टहनी के टुकड़े करते हुए मोलोतोचेक ने गहरी साँस ली.
 “ओह, नहीं, मरी तो अपनी ही कॉट पे. उसे होश भी आया था, कहते हैं, कि कुछ कहने की कोशिश भी की थी.”
 “मेरी कॉटेज में अभी तक मौत वाली कॉट पड़ी है,” अफ़ानासी इवानोविच ने कहा. “दद्दू उस पे गुज़र गए...एक बार लेटे और: “बस, अब नहीं उठूँगा”. दादी, अम्मा उन्हें शर्मिन्दा करने लगीं, पाप से डराने लगीं, मगर वो : “बकवास न करो, ज़िन्दगी के रास्ते से बिदा लेने दो”. और रात में – सब ख़तम...दादी को अपनी मौत में यक़ीन नहीं था, जिले में ले जाने को कहा – अस्पताल में, और एक हफ़्ते बाद उसे वापस लाए, शौहर की बगल में...”
“मगर सभी तो उस तरह नहीं मरते हैं, जैसे झेन्का ने बताया...मतलब, तैयार होकर,” ट्रैक्टर-ड्राइवर गेन्नादी को याद आया. “ये...माफ़ करना, दिमोन,” वो मेर्ज़्ल्याकोव की तरफ़ मुड़कर बोला, “तेरे चाचा, मिखाइल पेत्रोविच, सत्तर साल से ऊपर ही जिए, और वैसे ही, पहाड़ की तरह, रहे. जब ताबूत खींच रहे थे, तो लोगों की पीठ टूटते-टूटते बची. ‘ज़ापोरोझ्ये’ के थे...”
 “होता-आ है,” झेन्का ने गहरी साँस ली. “वो ज़िन्दगी भर हट्टेकट्टे रहे, मरे भी हट्टेकट्टे ही. मुझे याद है, किसी गेट के पास बैठे रहते, एकदम सूखे- जर्जर, मगर फिर भी पता चलता था, कि उनमें ताक़त है...हाँ, होता है...और जो समय से पहले मर गए, या जिन्हें मार डाला गया, उनके बारे में मैं नहीं कह रहा हूँ.”
 “हाँ, बात समझ में आ रही है,” अंकल वीत्या ने कहा. “प्राकृतिक रूप से मरना, ये भी सीखना चाहिए. जैसे कैन्सर – किसी किसी को महिने भर में खा जाता है, कुछ लोग सालों दर्द से चिल्लाते रहते हैं...”
 “हम, न जाने क्यों, निराशा के गर्त में जा रहे हैं,” अफ़ानासी इवानोविच काँपने लगा. “चलो, एक-एक घूँट और हो जाए.”
 “जैसा माहौल होगा, वैसी ही बातें होती हैं,” झेन्का ने ज़िद्दी कँटीली घास पर गिलास जमाते हुए कहा.
अंकल वीत्या सावधानी से गिलासों में वोद्का डालने लगा.     

            

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

Zona - 02.1

अध्याय – दो

देस पराए


सितम्बर के आरंभ में नतालिया सेर्गेयेव्ना प्रिवालिखिना मर गई.
गर्मियों भर किचन-गार्डन में धीरे-धीरे काम करती रही, पाला गिरने से पहले ही सारे काम निपटा लिए, सिवाय कैबेज के; खोद-खोदकर सब निकाला, सुखाया, शक्कर लगाई, नमक लगाया, नीचे गोदाम में रख दिया, और फिर पोर्च में गिर गई. बड़ी देर तक पड़ी रही, ताक़त समेटती रही और कल्पना करती रही कि उसे कहाँ जाना चाहिए – कॉटेज में या बागड़ के बाहर. बेशक, कॉटेज में जाना, खटिया पे लेटना ही ज़्यादा अच्छा रहेगा...और अगर उठ ही न पाई तो? पड़ी रहेगी बिना पानी के, सारा फ़र्श गन्दा करेगी; और मर गई, तो बदबू आने लगेगी, पूरा घर मुर्दे की बदबू से भर जाएगा. लोग तो पता नहीं कब आएँगे...ख़ैर, देर-सबेर पता चल ही जाएगा, कि कई दिनों से दिखाई नहीं दी है; आएँगे, और वो...नाक बन्द करेंगे. और इसलिए, जैसे ही कुछ हल्कापन महसूस हुआ, नतालिया सेर्गेयेव्ना उठी और चौपायों पर आँगन में गेट की तरफ़ रेंगने लगी. मुर्गियाँ उसकी तरफ़ देख रही थीं, और मुर्गे ने उत्तेजना से चिल्लाकार गर्दन झटकी...वहाँ पहुँचकर, खम्भे को, हैण्डल के ब्रेकेट को पकड़कर वो उठी, गेट खोला, बाहर सड़क पर झुकी.
दुनिया का ये छोटा सा टुकड़ा न जाने कब से उसे परिचित था. हर रोज़, आधी शताब्दी से भी ज़्यादा, जब से यहाँ पति के पास आई थी, वो इसी गेट से होकर आँगन से बाहर निकलती थी, कभी पानी के लिए कुएँ तक, कभी दुकान पे, कभी गाएँ भगाती, पहले कभी बच्चों को और बाद में पोतों को खाने के लिए आवाज़ देती. सड़क के किनारे बनी हुई कॉटेजेस को, बागड़ों को, गेट्स को, घास को जैसे देखती ही नहीं थी, मगर यदि कोई छोटी सी चीज़ भी बदल जाती – जैसे मेर्ज़्ल्याकोवों के गार्डन का कोई फ़ट्टा गिर जाता, या गूसिनों की खिड़कियों पर नया रंग लगाया जाता, या किसी की बागड़ के किनारे-किनारे काँटों वाली घास ऊग आती, - तो उसे फ़ौरन पता चल जाता था, और फिर ख़याल देर तक इसी छोटी सी चीज़ के इर्द-गिर्द घूमते रहते: “अपने वाले से कहना होगा कि बागड़ को ठोंक दे...कँटीली झाड़ी को काट के फेंक दे...पेंट लाना पड़ेगा और लगाना पड़ेगा – उखड़ गया है...एक हफ़्ते बाद रंग लगाऊँगी – एकदम ज़रूरत नहीं है, वर्ना सब कहेंगे: नताश्का की आँखें तब खुलीं, जब औरों ने काम कर लिया...
और इस समय एक हाथ से कुंदे को और दूसरे से लकड़ी के लेटर-बॉक्स को पकड़े वह गेट के बीच में झूलते हुए खड़ी थी (लेटर-बॉक्स पे ज़्यादा ज़ोर डालने से डर रही थी – टूट जाएगा), और हसरत से दाईं ओर की इन दो कॉटेजेस की तरफ़ देख रही थी, भूरी घनी बागड़ों को, क्यारियों में लगी बर्ड-चेरी की लाल पत्तियों को, पहाड़ी पर लगे चीड़ के पेड़ों की गहरी-हरी, लगभग नीली टोपियों को. वहीं कब्रिस्तान था.
रास्ते का छोर नदी पर टिका था, किनारे पर छोटे-छोटे पुल थे. हर साल मई में बर्फ़ की बहती हुई चट्टानों के कारण वे टूट जाते थे, आड़े-टेढ़े हो जाते थे, और मर्द बिना बड़बड़ाए फिर से नए पुल बना देते थे, जैसे ये कोई अवश्यंभावी प्राकृतिक घटना हो...औरतें इन पुलों पर कपड़े धोती थीं, और पहले – जब पम्प्स नहीं आए थे, जो पाइपों और रबड़ की नलियों से गाँव के लगभग हर आँगन में पानी पहुँचाते थे –जानवरों के लिए और स्नानगृह के लिए, और गार्डन के लिए भी पानी लाती थीं...मर्द लोग पुलों से मछली पकड़ते थे; पहले  अच्छी मछली होती थी – डेस को तो कोई मछली गिनता ही नहीं था, लेन्का और ग्रेलिंग से ख़ुश हो जाते थे. अक्सर ट्राउट भी फंस जाती थी, काफ़ी पहले एक दुर्घटना हुई थी: बुढ़िया गूसिना, ख़ुदा उसे जन्नत बख़्शे, जो तब जवान थी, कपड़े धो रही थी, और साल भर का बच्चा किनारे पर खेल रहा था. घास पे. किनारा ढलवाँ था, पानी छिछला, बैकवाटर्स – प्रवाह बिल्कुल नहीं... गूसिना धो रही थी- धो रही थी, आँखें उठाईं – बच्चा ग़ायब हो गया था. भागी, ढूंढ़ने लगी, पानी का तल भी छान मारा – नहीं मिला...मर्द लोग भागे-भागे आए, शाम तक नदी को खंगालते रहे...फिर बुज़ुर्गों ने कहा: “ट्राउट खींच के ले गया”. और फिर सब, गूसिना भी - ये बात नहीं कि सबने इत्मीनान कर लिया – मगर वे ख़ामोश हो गए: हाँ, सही है, अगर ट्राउट खींच ले गया है, तो कुछ नहीं किया जा सकता. क़रीब पचास साल पहले हुआ था ये हादसा, मगर ऐसा लगता है, जैसे तीन ही साल गुज़रे हों. नतालिया सेर्गेयेव्ना ने महसूस किया जैसे इस समय वह एक लड़की हो, जो अभी-अभी माँ-बाप से बिछड़ी हो, जिसने मर्द को जाना हो, और अब पड़ोसन का दुख देखकर, समझ गई हो, कि हमेशा चौकस रहना होगा, बच्चा वैसे भी डूब सकता है - माँ से दो क़दम की दूरी पे, घास में आराम से खेलते-खेलते... वह कुछ ऊपर की ओर उचकी, जिससे नदी को देख सके, मगर नहीं देख पाई. ताज्जुब हुआ: एक ज़माने में तो बस, गेट खोलने की देर थी, कि नदी की चमचमाती लहरें चकाचौंध पैदा कर देती थीं, मगर बाद में चुपचाप आँखों से ओझल हो गई – नतालिया सेर्गेयेव्ना को दिखाई देना बन्द हो गई. या तो ढलान से पहले वाला रास्ते का टीला ऊँचा हो गया, या फिर उसकी अपना क़द ही छोटा हो गया, कमर इस तरह झुक गई, कि कितना भी खींचो, सीधी नहीं हो पाती थी. ‘काश, यहाँ से कोई गुज़र ही जाता’, उसने ये महसूस करते हुए प्रार्थना की कि ताक़त फिर से ख़त्म हो रही है, टाँगें मुड़ रही हैं और जल्दी ही उसे थामने से इनकार कर देंगी.
ये बात नहीं, कि उसे कहीं दर्द हो रहा था, शरीर के भीतर कुछ टूट रहा था, कट रहा था, जैसा, उसे मालूम था, उसने सुना था, कि कई बूढ़े लोगों के साथ मौत से पहले होता है. कई बार मरते हुए लोगों की खटिया के पास बैठना पड़ा था, और वो बढ़ा चढ़ाकर और दुख से अपने आख़िरी अनुभव को ज़रूर बांटते थे: “गार्डन में जा रही थी, देखा कि गाजर से अंकुर फूटा है – हँस के जैसा. कल तो कुछ भी नहीं था, मगर आज एकदम इत्ता बड़ा. उसे उखाड़ने के लिए झुकी. चलने में भी मुश्किल हो रही थी. और, आँखों में जैसे काला-काला पानी भर आया, कान जैसे रूई से बन्द कर दिए हों. और – बस. कुछ याद नहीं, कि यहाँ कैसे लाए, कैसे लिटाया. अब सब हो गया, अब उठ नहीं पाऊँगी...शैतान ने ही इस घास को देखने के लिए धकेला था”. या फिर ऐसे: “बर्दाश्त नहीं कर पाया, रूह निकल रही है, कुछ नहीं किया जा सकता – ये लकड़ियाँ छीलनी थीं...ऐह, महंगी पड़ीं वे मुझे. अब देखो, वो तो पड़ी हैं, और मैं...”.
नहीं, किसी दर्द का या टूटन का एहसास उसे नहीं हुआ था. मतलब – बेशक, कमर में, घुटनों में दर्द तो होता रहता था, कनपटियों के ऊपर चुभन का एहसास होता था, साँस लेने में तकलीफ़ होती थी, और हर साँस के साथ सीने में जैसे कुछ चरमरा जाता था. मगर ये सब तो होता ही रहता था, ये सब तो कब से दर्द करता था और चरमराता था. मगर कमज़ोरी... कमज़ोरी नई चीज़ थी, असाधारण थी, एक सम्पूर्ण तरह की कमज़ोरी. जैसे भीतर से कोई महत्वपूर्ण, ज़रूरी चीज़ बाहर निकल गई हो, ऐसी चीज़ जो सत्तर से ज़्यादा साल हिलने डुलने पर मजबूर करती थी. दिन-ब-दिन, दिन-ब-दिन... और अब तो क़दम ही नहीं उठा सकती, हाथ ऊपर नहीं उठा सकती. और, वह जान गई कि डॉक्टर की किसी भी सुई से, पहले की तरह, अब कोई फ़ायदा नहीं होगा.
वह आँगन और सड़क के बीच दस मिनट या एक घण्टा खड़ी रही. अब उसके पास महसूस करने वाला वह अंग नहीं बचा था, जो समय मापता है. दिमाग़ में बवण्डर उठ रहा था, विचारों का नहीं, यादों का भी नहीं, बल्कि किन्हीं टूटे-फूटे टुकड़ों का, कटे-फ़टे चीथड़ों का....बहुत बुरा लग रहा था कि गोभी नहीं तोड़ पाई, उसे नमक नहीं लगा पाई. कद्दूकस ले आई थी, टब भी तैयार है – बस, उसे भाप देकर वापस तहख़ाने में रख देना बाकी था...छोटे-छोटे गाजरों की दो बाल्टियाँ धो ली थीं, अब वो नरम पड़ जाएँगे, सड़ जाएँगे...ये ख़याल भी दिल को डरा गया गया कि बच्चों को, पोतों को, भाई को सूचना देंगे या नहीं कि दफ़नाने के लिए आ जाएँ. सब के पते किचन वाली मेज़ पे पन्नी के नीचे रखे हैं – पड़ोसी अन्दाज़ लगा लेंग़े, ढूँढ़ लेंगे – कई लोगों के यहाँ ज़रूरी कागज़ात पन्नी के नीचे ही हिफ़ाज़त से रखते हैं...फोन में सबके नम्बर हैं, फ़ोन अलमारी के ऊपर है... पता कर लेंगे...मगर वो लोग, बच्चे, पोते, इत्ती दूर आयेंगे कैसे?...भाई तो पास ही, कुताय में है, मगर ये... एक रात नोवोसिबिर्स्क में, दूसरी – तोम्स्क में, बेटा वैसे भी पेर्म में रहता है...मगर बेटा छोटी बेटी के साथ अभी जुलै में ही तो आया था, छुट्टियों के कुछ दिन उन्होंने यहाँ गुज़ारे थे. और अब – दुबारा...मगर सबसे कठिन बात ये थी, कि नतालिया सेर्गेयेव्ना नहीं जानती थी कि उसे कहाँ दफ़नाएँगे. कब्रिस्तान तो ये रहा, सामने वाले आँगनों के पीछे, वहीं पर दफ़न है पति और उसके सारे रिश्तेदार, क्या उसे भी वहीं दफ़नाने का फ़ैसला करेंगे...
क़दमों की आहट सुनाई दी, और बागड़ के पीछे से एक लड़का निकला. नतालिया सेर्गेयेव्ना पहचान नहीं पाई कि वो कौन है, किसका बच्चा है, वो मुड़ा और बोला:
 “नमस्ते, दादी नात्!”                          
वो उससे कहना चाहती थी कि किसी बड़े आदमी को बुला लाए, मगर गले से शब्दों के बदले एक कमज़ोर सी, मुश्किल से सुनाई दे रही फ़ुसफुसाहट निकली. जैसे रबर की नाव से बची खुची हवा निकलती है...लेटरबॉक्स से हाथ हटाने का, हाथ हिला कर, उसे अपने पास बुलाने का फ़ैसला किया, मगर जब तक फ़ैसला करती रही, बच्चा दूर जा चुका था. नदी की तरफ़ जा रहा था. नतालिया सेर्गेयेव्ना पीछे से उसे देखती रही, नज़र से ही उसे इधर उधर नज़र दौड़ाने को कहा, ये सुनने को कहा कि उसकी तबियत ख़राब है, मदद की ज़रूरत है...बच्चा धीरे धीरे छोटा होने लगा – पहले ढलान पर उसके पैर ग़ायब हुए, फिर कमर, और फिर सिर. सड़क ख़ाली है. मेर्ज़्ल्याकोवों की कॉटेज की खिड़कियाँ अंधी हैं, यहाँ से जा चुके गूसिनों की कॉटेज बन्द पटों की मिचमिची आँखों से देख रही थी...नतालिया सेर्गेयेव्ना के घुटनों ने चरमराते हुए जवाब दे दिया, जैसे सड़ी हुई लकड़ी गांठों पर टूट जाती है, और वह ज़मीन पर गिर पड़ी. गाँव में काफ़ी ज़माने से कोई मरता नहीं था. बूढ़ों को शहर के अस्पताल में ले जाते थे, और वे वहीं पर मरते थे; नौजवान, जो पहले आपस में लड़ाई-झगड़ा करते थे, या तो डूब गए, या स्प्रिट के ज़हर से, या मोटरसाइकल्स की दुर्घटनाओं में ख़त्म हो गए, या गाँव छोड़कर इधर-उधर चले गए थे.
मगर बिना मौत की, बिना कफ़न-दफ़न की ज़िन्दगी में कोई ग़लत बात तो थी, और इसलिए हालाँकि लोग नतालिया सेर्गेयेव्ना के जाने से दुखी तो हो गये, मगर उनमें जैसे जान आ गई. बूढ़ी औरतें बहस करने लगीं कि नतालिया सेर्गेयेव्ना को कौन नहलाएगा और कौन उसका सिंगार करेगा, बूढ़े लोग लगभग पूरे कोल्खोज़ समेत ताबूत बनाने में जुट गए. औरतें भोज की तैयारी के बारे में विचार-विमर्श करने लगीं. आठ मर्दों को क़ब्र खोदने के लिए भेज दिया... मतलब सारा गाँव भाग-दौड़ कर रहा था, जल्दी मचा रहा था, जिससे कि नतालिया सेर्गेयेव्ना के बच्चों और पोतों के आने तक हर चीज़ तैयार हो जाए. सुबह मर्द प्रिवालिखिनों के गेट के पास जमा हो गए, उन्होंने अपने फ़ावड़े, कुल्हाड़ियाँ तेज़ कीं, सिगरेट पी, आँगन से औरतों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं:
 “खिड़कियाँ नहीं खोलना चाहिए!...घास फ़ैलाना पड़ेगी!”
 “कौन सी घास डालेंगे?...”
“अजवायन के फूल, मुझे याद है...याद है, तोन्या चाची के लिए अजवायन के फूल डाले थे.”
 “किसी को फ़र के लिए भेजना न भूलना! तोड़ के रख लें...”
मर्द सुन रहे थे और उदासी से मुस्कुरा रहे थे.
 “हाँ, फ़र की ज़रूरत होगी,” डीज़ल वाले पॉवर स्टेशन पर काम करने वाले चालीस साल के, मज़बूत लेशा ब्र्युखानोव ने सहमति जताई.
 “फ़र कल तोड़ेंगे, ताज़ा-ताज़ा,” स्कूल में काम करने वाले अंकल वीत्या ने कहा. “चलो, ऊपर चढ़ें?”
घुरघुराते हुए, नाक सुड़सुड़ाते हुए, मानो ज़बर्दस्ती, उठे, शरीर को झटका दिया और सड़क के पार तिरछे चल दिए. कुँए के पास रुके, प्लास्टिक की बोतलों में पानी भर लिया...
मेर्ज़्ल्याकोवों के और गूसिनों के आंगनों के बीच एक गली थी, जो क़ब्रिस्तान की ओर जाती थी... मुर्दों को प्रमुख सड़क से ले जाते थे, आधा चक्कर लगाते हुए, नदी के पास ज़रूर रुकते थे, जिससे दुनिया छोड़ कर जाने वाला बिदा ले सके; बाक़ी दिन क़ब्रिस्तान इसी तरह जाया करते थे, गली से होकर.
मगर अब बिरले ही जाते थे – पगडंडी लगभग लुप्त हो चुकी थी, दाएँ और बाएँ से इस जगह को पाले से सूख चुकी, मगर अभी भी ज़िन्दा, दुष्ट कंटीली झाड़ियाँ दबा रही थीं.
आगे-आगे जाते हुए ब्र्युखानोव ने दस्ताने वाले हाथ से चेहरे के ऊपर आते हुए तनों को तोड़ा, बाकियों ने भी पैरों से, फ़ावड़ों से पगडंडी को साफ़ किया – उन्हें मालूम था: औरतें और बूढ़ियाँ आज ही क़ब्रिस्तान की ओर आयेंगी. रिश्तेदारों को देखेंगी और बताएँगी कि जल्दी ही नतालिया आण्टी उनके पास आने वाली है.
क़ब्रिस्तान एक लम्बी ऊँची जगह पे था जिसके चारों तरफ़ ढलान थी. रेत, ऊँचे-ऊँचे चीड़ के पेड़, और उनके बीच – क़ब्रें. मृतकों को एक दूसरे से सटाकर नहीं दफ़नाया गया था, लम्बे-चौड़े बाड़ों के अन्दर, जहाँ लेटे हैं परदादा, दादा, पिता...कुछ बेहद पुराने स्मारक भी थे – तीस के दशक तक क़ब्रिस्तान किसी और जगह था, लगभग गाँव के बीचोंबीच, चर्च की बगल में. मगर फिर वहाँ दफ़नाने पर पाबन्दी लगा दी गई, और पचास के दशक के किसी साल में चर्च को तोड़ दिया गया, कुछेक क़ब्रों को यहाँ स्थानांतरित कर दिया, कुछेक को नष्ट कर दिया. पुराने क़ब्रिस्तान को ज़मीनदोस्त कर दिया गया, चौक को तोड़ दिया और वहाँ युद्ध में शहीद हुए वीरों के लिए स्मारक बना दिया गया.
चीड़ के पेड़ों के नीचे स्थानांतरित की गई क़ब्रों की कोई देखभाल नहीं करता था– वैसे भी दस पीढ़ियों तक के अपने रिश्तेदारों को इक्के-दुक्के लोग ही याद रखते हैं. मतलब, स्मारकों को जैसे समूहों में लाया गया था, वैसे ही वो पड़े हैं, काई से ढंके हुए. मगर पुराने क़ब्रिस्तान से लाए गए ग्रेनाइट के कुछेक सलीब अलग-थलग दिखाई दे जाते हैं. इतनी सफ़ाई से उन पर पॉलिश किया गया था कि आज भी चकाचौंध पैदा करते हैं, शीशे की तरह, उन पर कोई काई-वाई नहीं जमती...कहते हैं कि उन्हें एनिसैस्क के कारीगरों ने बनाया था, और काफ़ी पैसे लेकर स्थानीय कारीगरों ने भी, जिनके लिए संभव था, उन्होंने ख़रीदे, बड़ी मुश्किल से यहाँ तक लाए. आम तौर से सर्दियों में लाते, कड़ी बर्फ पर, मगर सबसे ज़्यादा बेसब्रे लोग गर्मियों में भी लाते थे – नावों में रखकर, ऊपर, बहाव के विपरीत.
अब तक एक कहानी, या लोककथा प्रचलित है कि कैसे एक अमीर किसान किब्याकोव ने प्रण किया कि बीबी की कब्र पर साल भर के भीतर सलीब लगवायेगा. गाँव के बिल्कुल पास, तेज़ धार में, नाव उलट गई, ग्रेनाइट की सलीब डूब गई. काफ़ी देर तक लोग उसे रस्सियों से बांधकर बाहर खींचने की कोशिश करते रहे. दो हफ़्तों तक खटते रहे, बार-बार गोते लगाने से बीमार पड़ गए, और जब ये स्पष्ट हो गया, कि सलीब नदी के तल में ही रहेगा, तो किब्याकोव ने पानी में छलांग लगा दी और बाहर नहीं आया. ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की गई – या तो बहाव के साथ एनिसेय की ओर चला गया या फिर किसी लंगर के नीचे दब गया, मछलियों की ख़ुराक बन गया...
क़ब्रिस्तान के चारों ओर किसी तरह बागड़ बना दी गई है – चीड़ के पेड़ों पर दो-दो, तीन-तीन बल्लियाँ ठोंक़ दी गई हैं. ख़ास बात ये, कि जानवर भीतर न घुस जाएँ, टीलों को न कुचल दें, स्मारकों से चिपककर अपनी पीठ न खुजाएँ. पहले, ऐसा होता था, कि दफ़नाने के बाद ताज़ा क़ब्रों की चौकीदारी करनी पड़ती थी – मृत शरीरों की सड़ान सूंघकर यहाँ भालू घुस जाते थे. कब्रिस्तान का पिछवाड़ा एक नम खाई में खुलता था, जो ब्ल्यूबेरीज़ और किशमिश की झाड़ियों से लदी थी, और खाई के पीछे से शुरू होता था असली तायगा – जहाँ घुप अंधेरा था, और जिसमें प्रवेश करना असंभव था. मगर पिछले कुछ सालों से भालू और अन्य जानवर गाँव की तरफ़ नहीं आते थे – जैसे कि उन्हें मालूम हो गया था कि जल्दी ही यहाँ कुछ नहीं बचेगा. सिर्फ रुका हुआ खट्टा पानी और कीडों जैसी छोटी-छोटी मछलियाँ...
हल्के, खम्भों में फ़िट किए गए गेट्स खोलकर (गेट्स और दो सीमेंट के खम्भे मज़बूत दिखाई देते थे, और आगे, दाईं और बाईं ओर – तनों के बीच-बीच बिना छिले लकड़ी के खंभे), मर्द लोग क़ब्रिस्तान की सीमा में आए और फ़ौरन ख़ामोश हो गए, जैसे ख़यालों में मृतकों का अभिवादन कर रहे हों.
चारों ओर से उनकी ओर देख रहे थे बुज़ुर्ग, जवान या बच्चों के चेहरे. और इन सभी अंडाकार चित्रों की नज़रों का भाव बिल्कुल एक जैसा था, जैसे कब्र के स्मारक के लिए ख़ास तौर से फ़ोटो खिंचवाई हो. वीत्का लोगिनोव भी, जो हमेशा पूरे दाँत दिखाते हुए हँसता था, ऐसे देख रहा था, जैसे दुखी हो, बिदा ले रहा हो, परेशान हो, जैसे बुला रहा हो... ब्र्युखानोव की नज़र उसकी आँखों पर टिकी, और वो फ़ौरन मुड़ गया. वे दोस्त थे, स्कूल भी साथ-साथ समाप्त किया था, फिर पॉलिटेक्निक, एक साथ काम करना शुरू किया और चौबीस साल की उम्र में वीत्का की करंट लगने से मौत हो गई...ब्र्यूखानोव के सामने ही मर गया...तब से क़रीब बीस साल गुज़र चुके हैं, ब्र्युखानोव अभी भी अपने आप को जवान ही समझता है, और वीत्का कब का गुज़र चुका है, कित्ती सारी बातें उसने नहीं देखीं, नहीं जानीं, कित्ती सारी बातों से ख़ुश नहीं हुआ. शादी भी नहीं कर पाया: “घूमना फिरना चाहिये, अनुभव इकट्ठा करना चाहिए”.
 “प्रिवालिखिनों की बागड़ कहाँ है, किसे पता है?” ब्र्युखानोव ने रुखाई से, कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से पूछा.
 “ये, यहीं कहीं है,” बढ़ई अफ़ानासी इवानोविच ने, इसके विपरीत, हौले से, मृतकों के प्रति सम्मान दिखाते हुए जवाब दिया, “गेट से कुछ ही दूरी पे है. वे तो यहाँ के पुराने निवासी हैं. बाकी लोगों ने इस ‘यहीं’ से गाँव नहीं, बल्कि क़ब्रिस्तान समझा. हाँ, यहाँ काफ़ी सारे प्रिवालिखिन पड़े हैं. पुराने क़ब्रिस्तान से यहाँ नतालिया सेर्गेयेव्ना के पति के चाचा – ‘रेड पार्टिज़न’ - को लाया गया था. उसके स्मारक की ऊँची मीनार के चारों ओर चिर विश्राम के लिए बीबी को, भाइयों को, बेटों को, बेटियों को, भतीजों को बसाया गया, और अब कल नतालिया सेर्गेयेंवा भी यहाँ  चिर निद्रा में सो जाएगी. इस बागड़ में विश्राम पाने वाली शायद वो अंतिम होगी.
मर्द ढूंढ़ना शुरू करने ही वाले थे, कि अंकल वीत्या ने फ़ौरन उन्हें बुलाया:
 “मिल गई.”
फिर से इकट्ठे हो गए. जगह का जायज़ा लेते हुए कुछ देर ख़ामोश खड़े रहे. और जल्दी भी कहाँ की थी, कब्रिस्तान में जल्दी मचाना भी नहीं चाहिए.
अफ़ानासी इवानोविच सिगरेट पीने लगा; उसके बाद बाकी लोगों ने भी सिगरेट पीना शुरू किया. स्मारकों, सलीबों, टीन के सितारों वाले बचे हुए चबूतरों की ओर देखते रहे, मृतकों की नज़रों से नज़र न मिलाने की कोशिश करते रहे. चारों ओर नज़र घुमाते रहे.
चीड़ के पेड़ काफ़ी ऊँचे थे, वे एक जैसे नहीं थे, मगर उनके शिखर एक दूसरे से मिल रहे थे, और ज़मीन पर हमेशा छाया, ठण्डक रहती थी. नहीं, दमघोंटू गर्मी भी हुआ करती थी, मगर उसके लिए ज़रूरी था कि लगातार कई दिनों तक ख़ूब गर्मी पड़ती रहे. फ़िलहाल – ठीक है. ताज़गी है.  पुरानी पड़ चुकी, मरियल घास बढ़िया ख़ुशबू बिखेर रही थी, बेहद कमज़ोर हवा हौले-हौले टहल रही थी. कुछेक कब्रों के पास रोवन के पेड़, छोटे-छोटे क्रिसमस-ट्री के पेड़ उग आए थे, जो धूप के बिना मज़बूत नहीं हो पा रहे थे. कृत्रिम फूल, पेंट की हुई बेंचें, मेज़ें अपनी चटख शोख़ी बिखेर रहे थे...किसी बड़े कॉमन-हॉल की तरह, और चीड़ों के शिखर – गुम्बद जैसे प्रतीत हो रहे थे. इस हॉल में ख़ामोशी है, सिर्फ कहीं एक कठफ़ोड़वा पेड़ पर मार किए जा रहा है, मगर ये पैनी आवाज़ सिर्फ महान, गंभीर शांति को ही रेखांकित कर रही है.
लेशा ब्र्युखानोव न जाने क्यों उदास हो रहा था, उसने सिगरेट का टुकड़ा ज़मीन पर फेंका जूते से उसे मसल दिया. बोला:
 “क्या, चलो. करना तो पड़ेगा ही...”
“हाँ, बेशक, करना पड़ेगा”, इस बात से कुछ राहत महसूस करते हुए कि उसने पहले ये बात नहीं कही, अंकल वीत्या ने समर्थन किया; वह उस जगह गया, जहाँ नतालिया सेर्गेयेव्ना का शौहर दफ़न था. अब फ़ोटो देखते हुए, छोटे से विवरण को पढ़ते हुए कुछ देर उसकी कब्र के सामने खड़े हो गए : ‘प्रिवालिखिन डेनिस स्तेपानोविच 9.07.1935 – 11.08.2002’. विवरण संगमरमर की पट्टी पर खुदा था, जिसे धातु के, चांदी का पॉलिश चढ़ाए स्मारक पर कस दिया गया था...   
सात साल पहले मरा था, मगर ऐसा लगता है, कि हाल ही में गुज़रा है, अभी-अभी तो उसे देखा था, भौंहें चढ़ाए, नदी से अपने आँगन की ओर जाते हुए, भौंहे हमेशा चढ़ी रहती थीं, चाहे थैला मछलियों से भरा हो या ख़ाली हो. या आँगन के पीछे सफ़ाई करते हुए, या शाम को सामने वाले गार्डन के पास बेंच पर सिगरेट पीते हुए...हाँ, याद बिल्कुल ताज़ी है, मगर देखो तो – सात साल.
मगर यदि दिमाग़ में घटनाओं को दुहराने लगो, तो पता चलता है कि कितना कुछ इन सालों में हो गया है... वैसे, असल में “कितना कुछ” नहीं, बल्कि एक ही : जब प्रिवालिखिन मर रहा था, तब गाँव शक्तिशाली, फला-फूला था, मौत के ख़तरे को भूल चुका था, जो अस्सी के दशक में आ ही रही थी, मगर फिर पीछे चली गई; अब तो वह आने ही वाली है, कुछ ही महीने बचे हैं, हद से हद – एक साल...  
और डेनिस स्तेपानोविच मर्दों की ओर अपनी हमेशा की तरह, हल्की चिड़चिड़ाहट भरी नज़र से देख रहा था, उन्हें ऐसा लगा कि जैसे ये नज़र पूछ रही हो: “तो, क्या करना है? करोगे क्या? हमें अकेला छोड़ दोगे?” हाँ-आ...एक दशक के बाद तो ये स्मारक, ये फ़ेन्सिंग्स पूरी तरह टूट जाएँगे, मरम्मत के क़ाबिल नहीं रहेंगे, फिर हर चीज़ झाड़ियों से ढँक जाएगी, और धरती की सतह से क़ब्रिस्तान का नामो-निशान मिट जाएगा.
कुछेक मृतकों को उनके रिश्तेदार क़रीब पच्चीस साल पहले ही ले गए थे, जब पहली बार ऊपर वाले लोगों ने अनुमान लगाया था कि भविष्य का जलाशय उस जगह को डुबा देगा, जहाँ गाँव स्थित है. सबसे ज़्यादा फुर्तीले लोग तभी गाँव छोड़कर जाने लगे और अपने रिश्तेदारों की हड्डियाँ साथ में ले गए, अपने दादा-दादियों की... अगर भटकते हुए, सूखे कांटों से ढंके गहरे गढ़ों पर नज़र पड़ जाए, तो समझ लो, कि ये खुदी हुई कब्रों के अवशेष हैं.
मगर फिर मॉस्को में सरकार बदल गई, निर्माणाधीन पॉवर स्टेशन को अधूरा छोड़ दिया गया. विस्थापन की बातें थम गईं, कई लोग तो शोरग़ुल वाली दुनिया से अपनी मातृभूमि लौट आए. और अब - धम्! – और फिर से : निर्माण को पूरा करने का फ़ैसला किया गया है, डूब के क्षेत्र में फलाँ-फ़लाँ “गाँवों की बस्तियाँ” आएँगी. उन्हीं मे उनका गाँव पील्योवो भी है.
 “कहाँ खोदेंगे?” आने वालों में से सबसे जवान, कोल्या क्रिकाऊ ने पूछा, जो पिछले से पिछले साल फ़ौज से वापस लौटा है और आजकल सिर्फ सोचता रहता है, कि उसे क्या करना चाहिए: क्या कहीं चला जाए, और, अगर जाना हो, तो कहाँ जाए, - बाएँ, दाएँ?                     
 “बीबी को वहाँ लिटाते हैं,” अंकल वीत्या ने जवाब दिया – “शौहर के दाहिनी ओर.”
ब्र्युखानोव कुछ दूर गया, देखा, कि औरों के यहाँ कैसा है. उसने वापस आकर सिर हिलाया:
 “हाँ, आम तौर से ऐसा ही है.”
 “मगर यहाँ तो बगल में चीड़ का पेड़ है, जडें परेशान...”
 “क्या किया जाए, फ़ावड़े हैं, और ख़ास जड़ को छोड़ सकते हैं...ठीक है, चलो, शुरू करें.”
ब्र्युखानोव और क़ब्रे खोदने के बारे में जानकारी रखने वाला – क्योंकि अपने ज़माने में कई बार इस काम में शामिल हो चुका था – ग्लूखिख2 , जो लापरवाही की वजह से पचास का होते-होते सिर्फ झेन्का कहलाता था, फ़ावड़ों से ज़मीन में समकोण बनाते हुए खोदने लगे. कोल्या क्रिकाऊ ने सोवियत डिपो के फ़ावड़े से समकोण बनाए, उन्हें एक तरफ़ कर दिया. बाकी लोग कुछ देर के लिए बैठ गए, कोई उकडूँ बैठा, कोई पालथी मार के – अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे.
नतालिया सेर्गेयेव्ना की कॉटेज में हल्की, फुसफुसाहट भरी ज़िन्दादिली है.
मृतक मेज़ पर पड़ी है, उसे नहला दिया गया है और वो पोषाक पहना दी गई है, जो उसने स्वयम् के लिए तैयार करके रखी थी: पड़ोसनों ने आसानी से अलमारी के ऊपरी ख़ाने में वो पैकेट ढूँढ़ लिया, जिसकी ज़रूरत थी. ताबूत का इंतज़ार हो रहा था, और उसके लिए बड़े कमरे के बीच में जगह ख़ाली कर दी गई थी, स्टूल्स रख दिए थे. आईना और टीवी काले रुमालों से ढाँक दिए गए. अलमारी के ऊपर मोमबत्तियाँ पड़ी थीं – पतली-पतली, जिन्हें कुताय के चर्च के भग्नावशेषॉ से ख़रीदा गया था.
पिछली गर्मियों में वहाँ, भूतपूर्व जिला-केन्द्र में, “देहात से बिदा” नामक एक शोकपूर्ण आयोजन हुआ था. बिदा तो जैसे सिर्फ कुताय से ही ले रहे थे, मगर वहाँ आस-पास के गाँवों से भी बहुत लोग आए थे, वो भी आए थे, जो वर्तमान ज़िला-केन्द्र में – कोल्पीन्स्क्स, एनिसैस्क, लेसोसिबिर्स्क, क्रास्नोयार्स्क जैसे शहरों में रहते थे, बल्कि उससे भी दूर की जगहों से आए थे.    
जन समुदायों के कार्यक्रम हुए थे; जिले के, प्रदेश के नेताओं के, प्रसिद्ध स्थानीय लोगों के भाषण हुए थे. शाम को आसमान में आतिशबाज़ी दिखाई दे रही थी...
 “बिदा” में पादरी भी आया था, उसने चर्च ऑफ़ द सेवॉयर के खण्डहरों पर मेमोरियल सर्विस भी की थी. आस्तिक, और नास्तिक भी आशीर्वाद के लिए आए, मोमबत्तियाँ ख़रीदीं और उन्हें चर्च की साबुत बची दीवारों की नक्काशी पर चिपका दिया. कई लोग मोमबत्तियाँ अपने साथ ले गए.
और अब इन्हीं मोमबत्तियों से बचाकर रखी हुई चार अलमारी के ऊपर पड़ी थीं और इंतज़ार कर रही थीं कि उन्हें कब मृतक के ताबूत के पास जलाया जाएगा.
जैसी कि नतालिया सेर्गेयेव्ना ने उम्मीद की थी, नौजवानों ने उसके मोबाइल फोन में बच्चों के नम्बर ढूँढ़ लिए. वे दफ़्तर गए, जहाँ सिग्नल अच्छे आते थे, बच्चों को फ़ोन किए. कुताय वाले भाई को भी ख़बर दे दी...
शाम होते-होते – नतालिया आण्टी की मौत के क़रीब चौबीस घण्टे बाद – ताबूत तैयार हो गया. औरतों ने उसके ऊपर लाल कपड़ा तान दिया, जो सोवियत समय से क्लब में पड़ा था.
 “कितना स्टॉक है!” ताबूत के बोर्ड्स को झंडियों के नीचे छुपते देख कर बूढ़े लोग मुस्कुरा रहे थे. “नारे वाले झंडों में लिपटाकर ले जा रहे हैं, और हम तो तीन दशकों से घर के सामान को सजा रहे हैं. थैंक्यू सोवियत सरकार, कम से कम कोई तो अच्छाई छोड़ी है.”
 “हाँ, काफ़ी अच्छी चीज़ें छोड़ी हैं!” गाँव की बूढ़ियों में से सबसे दबंग, ज़िनाइदा ने, जो अपने ज़माने में लीडर और एक्टिविस्ट रह चुकी थी, बहस शुरू कर दी. “अभी तक हटा नहीं पाए हैं.” मगर फ़ौरन संभल गई, कि अब ये कहने का मौका नहीं है, उसने पोती को ख़ाली सुई थमाते हुए कहा, “जल्दी से धागा डाल दे, मैं जल्दी से टाँका लगा देती हूँ. नताशा को लिटाने और वहाँ बैठने का टाइम हो रहा है...”
 “नूडल्स कौन बना रहा है?” दूसरी बूढ़ी, फ़्योदोरोवा ने, पूछा, जो मालिखोवों के भरे पूरे परिवार से थी. ये परिवार गाँव की आबादी का क़रीब एक चौथाई था.
 “वलेंतीना और गालिना लोगोनोवा बनाने वाली हैं.”
फ़्योदोरोव्ना ने बुरा मुँह बनाया, फिर कुछ याद करके सन्देह से बोली:
 “पता नहीं वो कैसे बनाती हैं, उनके नूडल्स कभी नहीं खाए...”
 “अफ़सोस की बात है – तौलिया नहीं है. तौलियों की मदद से ताबूत को नीचे उतारना चाहिए.”
 “क्या दुकान में नहीं है?”
 “न-हीं हैं. वहाँ सब कटे हुए हैं. नैपकिन्स हैं, न कि तौलिए.”
 “तब साधारण रस्सियाँ ले सकते हैं. वो सिंथेटिक वाली नहीं...”
पील्योवो में कॉटेजेस लगभग थी ही नहीं – और बची हुई – क़रीब सौ कॉटेजेस में से, एक भी ऐसी नहीं थी जहाँ कल के दफ़न और मेमोरियल के लिए कुछ न किया जा रहा हो. किसी के पास कटलेट्स के लिए बर्फ़ में दबा हुआ माँस मिल गया, किसी ने चूज़े देने की पेशकश की (काफ़ी सारे चूज़े अभी अभी अण्डों से निकले थे), कुछ और ने घोषणा की कि जैली बनाएँगे, कुछ ने पैन केक्स, कुछ और ने क्रिसमस पुडिंग बनाने का वादा किया...कोल्या क्रिकाऊ के मधुमक्खी-पालक पिता ने दो लिटर ताज़े शहद का डिब्बा दे दिया...
लोग संतुष्ट थे कि इस सार्वजनिक आयोजन में भाग ले रहे हैं. और ख़ास बात ये थी कि नतालिया सेर्गेयेव्ना को ‘ऊपर से’ बगैर किसी झंझट के दफ़नाने की अनुमति दे रहे हैं. नर्स ने उसकी जाँच की और लिखा: ‘जिस्म लम्बे समय से बीमार है, हिंसक मृत्यु के कोई निशान नहीं पाए गए, पोस्टमॉर्टम की ज़रूरत नहीं है’, - उसने वादा किया कि डेथ-सर्टिफ़िकेट जल्दी ही मिल जाएगा... गाँव में कोई अपना पुलिस इन्स्पेक्टर नहीं था – मतलब इन्स्पेक्टर कई गाँवों के लिए था, वो कुताय में रहता था. जब उसे फ़ोन किया गया, तो लेफ्टिनेंट ने कोई सवाल नहीं पूछे: ‘समझ गया – बूढ़ा इन्सान है, क्या किया जा सकता है... अफ़सोस है”. और, बस.
गाँव की कमिटी का प्रेसिडेंट, अलेक्सेइ मिखायलोविच त्काचुक उस समय शहर के अस्पताल में पड़ा था, उसके अलावा किसी और ने दफ़नाने की जगह के बारे में सवाल उठाना उचित नहीं समझा. और प्रेसिडेंट, अगर वो यहाँ होता भी, तो यक़ीन दिलाने की कोशिश नहीं करता कि शहर ले जाना बेहतर होगा, लोगों को एकजुट करने वाले इस भावावेग को नहीं तोड़ता...  
आख़िरकार ताबूत आ गया. ढक्कन को बागड़ की उस जगह पे टिकाया गया, जहाँ ख़तों के लिए झिरी बनी थी, और भूरी पार्श्वभूमि पे लाल धब्बा वहाँ से गुज़रने वालों की आँखों में चुभ रहा था, मृतका के बारे में सोचने पर मजबूर कर रहा था, इस बारे में, कि देखते-देखते क्या से क्या हो जाता है – इन्सान जीता है, जीता है, और - एकदम नहीं रहता. सब के साथ ऐसा ही होने वाला है. मगर, ख़ुदा करे, इसी तरह बिदा करें.
सबने मिलकर नतालिया सेर्गेयेव्ना को ताबूत में लिटा दिया, तकिया ठीक किया, कंबल टांक दिया. हल्की सी ख़ुशी हुई कि मृतका अभी ठोस है, ठण्डी है – ये अच्छा संकेत है, मतलब - वो ख़ुश है. फिर पलंग से परों वाला बिस्तर हटा दिया, जिसपे मालकिन मरी थी, उसे बाड़े में ले गए और मुर्गियों वाली भट्टी पर लटका दिया. पुरानी, सूख चुकी भट्टी चरमरा गई.
 “टूटेगी तो नहीं?”
 “बरदाश्त कर लेगी. मगर किनारे की तरफ़ खींचना चाहिए, वहाँ ठीक रहेगा.”
 “और मुर्गियों को भी सोने के लिए जगह बच जाएगी.”
 “मुर्गा फ्यूनरल-सर्विस गाता रहे...”
जब बाहर हवा में आए तो ज़ीना दादी ने कहा:
 “बिस्तर को ढाँक देना चाहिए. मुर्गियाँ ख़राब कर देंगी.”
गर्मियों वाले किचन में एक बढ़िया तह की हुई प्लास्टिक की चादर मिली, उसे बिस्तर के ऊपर डाल दिया.
 “हाँ, अब ठीक है. बिस्तर अभी अच्छा ही है.”
 “हो सकता है, कोई उसे ले जाए...”
 “ले जाने के लिए बहुत कुछ है. जैसे ही जनाज़ा ले जाने लगेंगे?...”
नाम लिए बिना नतालिया सेर्गेयेव्ना के बच्चों के बारे में बातें कर रहे थे.
 “ख़ुद ही पहुँच जाते तो अच्छा होता. समझ में नहीं आ रहा है, कि पहुँचेंगे कैसे. इस काम के लिए उन्हें हेलिकॉप्टर तो नहीं ना देंगे, और रेल से – सिर्फ गुरुवार तक ही आ पाएँगे...”
“ना-ना! ये कोई पुराना ज़माना नहीं है, जब हर छोटे-मोटे काम के लिए हेलिकॉप्टर मिल जाता था.”
 “मोटरबोट्स पर सबसे अच्छा है,” बूढ़े मेर्ज़्ल्याकोव ने अनुमान लगाया. “शहर में तो उनका अच्छा ख़ासा बिज़नेस है...”
 “शहर में – हा-हा! शहर से नदी क़रीब पन्द्रह किलोमीटर्स है!”
 “हूँ, किनारे पे...मैं वहाँ नहीं गया, मुझे मालूम नहीं है.”
कोल्या क्रिकाऊ का बाप, जो पूरे दिन आँगन से - जहाँ ताबूत बना रहे थे - प्रिवालिखिनों के गार्डन तक बिना कुछ किए घूमता रहा था; खोया-खोया सा काम का, भागदौड़ का निरीक्षण कर रहा था और पूरे दिन ख़ामोश था, आख़िरकार अपने आप पर क़ाबू न रख पाया:
 “एक और कॉटेज – विनाश की ओर.”
उसने ये बात इस तरह कही कि सब सर्द हो गए, सिकुड़ गए. कुछ पल वैसे ही खड़े रहे, जैसे बहरे हो गए हों, और बाद में इधर-उधर बिखरने लगे. कुछ लोग ड्योढ़ी की ओर चले, कुछ – गेट की तरफ़. सिर्फ बूढ़े मेर्ज़्ल्याकोव ने, कुछ देर बाद, वाक़ई में कड़वाहट भरे शब्दों में क्रिकाऊ से बहस करने की कोशिश की:
 “नतालिया का बेटा तो पेन्शनर है – वो तो ‘नॉर्थ’ में था. हो सकता है, वापस लौटने का फ़ैसला करे.”
 “कहाँ वापस आएगा!” क्रिकाऊ चिंघाड़ा, जैसे उसे उस सब को बाहर फेंकने का मौका मिल गया हो, जो एक आँगन से दूसरे आँगन तक घूमते हुए उसके भीतर खदखदा रहा था. “कहाँ? यहाँ तो हम सबको ही जल्दी ही!...बजरे N में सवार होकर – आगे और आगे.”
 “हूँ, कब से विस्थापन का डर दिखा रहे हैं, तीस साल पहले भी डराया था. मगर रह ही रहे हैं...”
 “जैसे अंगारों पे जी रहे हैं! धीरे-धीरे सब बर्बाद कर दिया – तब से न फॉरेस्ट-इण्डस्ट्री है, न ही कोई अन्य काम.”
 “ख़ुदा का शुक्र है. और सब कुछ इतना ग़लीज़ कर दिया. मैं अपने बिज़नेस से जीता हूँ, मुझे और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है. फॉरेस्ट-इण्ड-स्-स्ट्री!...”
 “अब जल्दी ही तेरा भी कोई बिज़नेस नहीं रहेगा! चार दीवारी में घुसा देंगे...”
दोनों बूढ़े, अभी तक मज़बूत, मगर पत्ते झड़ चुके गठीले पेड़ के खंभों जैसे, मवेशियों के बाड़े और लकड़ियाँ रखने के शेड के बीच की संकरी जगह पे खड़े थे, कांपती आवाज़ में एक दूसरे की तरफ़, असल में, इन खोखले शब्दों के बाण फेंक रहे थे और हर शब्द के साथ उनकी कड़वाहट बढ़ती जा रही थी. वे एक दूसरे के कान पे तेज़ झापड़ मारने को तैयार थे, उन्हें एक दूसरे में दुश्मन नज़र आ रहा था. ऐसा ही करते हैं पकड़े गए जानवर, जो पिंजरे में कई बार भागने के बाद और बाहर भागने का कोई रास्ता न पाकर एक दूसरे को नोंचना शुरू कर देते हैं.          

मगर सारासार विचार ने उन्हें रोक दिया, और, गुस्से से नाक सुड़कते हुए, पहले से भी ज़्यादा ताक़त से बकवास करते हुए, बूढ़े अलग अलग दिशाओं में चले गए. क्रिकाऊ – सड़क पे निकल गया, और मेर्ज़्ल्याकोव – गार्डन में. पहले इसलिए उस तरफ़ गया जिससे क्रिकाऊ से फिर न टकरा जाए, मगर, जब ज़मीन को देखा, तो एक उद्देश्य निकल आया: वारिस आएँगे, और किसी तरह, सावधानीपूर्वक उनके प्लान्स के बारे में जान लेना चाहिए; अगर वे यहाँ नहीं बसना चाहते हैं, तो प्रस्ताव रखेगा कि उसे, याने, मेर्ज़्ल्याकोव को बगीचे में आलू बोने दें. क्योंकि अगर ज़मीन को ऐसे ही छोड़ दिया जाए, तो दो-तीन सालों में उसमें झाड़-झंखाड़ उग आएँगे, उपजाऊ ज़मीन बंजर होने लगेगी...