कई सालों से
आलू ही स्थानीय लोगों की कमाई का प्रमुख साधन था. बर्फ़ जमने से पहले नदी से बजरे
गुज़रते और आलू ख़रीद लेते. फ़िलहाल, मेर्ज़्ल्याकोव के खलिहान में ठण्ड और गर्माहट से
बचाने के लिए तिरपाल और जूट से ढंके पैंतीस बोरे तैयार पड़े थे. अगर भाव पिछले साल
वाला ही रहा, तो ये बनते हैं क़रीब पचास हज़ार रूबल्स...पहले तो गाजर, मूली, पत्ता
गोभी भी ख़रीदते थे, मगर फिर न जाने क्यों बन्द कर दिया...क्रैनबेरीज़ भी बेची जा
सकती हैं, बेशक, अख़रोट भी. मशरूम्स. ब्ल्यूबेरीज़... जानवरों की खालें...उनका इलाका
बहुत दयालु है, किसी को भूखे नहीं मरने देगा. थोड़ा हाथ-पैर हिलाओ – और खाने-पीने
का इंतज़ाम हो जाता है, नोटों की छोटी सी गड्डी मिलने की संभावना उत्पन्न हो जाती
है.
ज़मीन पतली परत
वाली थी, क़रीब पाँच से सात सेंटीमीटर्स, और उसके नीचे बस रेत ही रेत थी, सिर्फ जड़ों
के चारों ओर काली मिट्टी के कुछ ढेर बन गए थे, मानो जड़ों ने ख़ुद ही हल्के भूरे
भूमिगत रेगिस्तान में पोषक ढेलों को धकेला हों.
रेत की पर्त
क़रीब डेढ़ मीटर नीचे तक थी, फिर विरले पाए जाने वाले बहुमूल्य पत्थरों वाली नम,
चिकनी मिट्टी शुरू हो रही थी.
“यहीं से चीड़ के पेड़ों को ख़ुराक मिलती है,” अंकल
वीत्या ने कहा, ये देखकर कि कोल्या क्रिकाऊ दिलचस्पी से अपने फ़ावड़े से निकाली गई
चीज़ को ऊँगलियों से मसल कर देख रहा है.
“बिल्कुल तेल जैसा है...और कंकड़ – जैसे नदी में
मिलते हैं...यहाँ क्या, पहले नदी का तल था?”
“ऐसा ही लगता है.”
“हे-हे,” ब्र्युखानोव हँस पड़ा, “पहले हर तरफ़ नदी
का तल था. ‘एनिमल प्लेनेट’ चैनल तुम्हारे यहाँ आता है?”
“हुम्, हाँ...मगर टी.वी. चैनल एक बात है, और दूसरी
– जैसे ये...पहाड़, नदी ये रही यहाँ...मगर – तल.”
“महान जल-प्रलय के निशान,” ट्रैक्टर ड्राइवर गेन्नादी
ने, जो बेहद आलसी था, या सही कहें तो जिसे अपने हाथों से काम करना पसन्द नहीं था, दार्शनिक
अंदाज़ में कहा. और इस समय भी वह जड़ें तोड़ने के लिए सिर्फ फ़ावड़ा लेकर आया था, मगर
सामने वाली जड़ों को दूसरे आदमी के लिए छोड़कर उसे अभी तक चलाया भी नहीं था. जल
प्रलय की याद दिलाना प्रासंगिक ही था, सब ने सम्मानपूर्वक गर्दन हिला दी. सब लोग
चुप हो गए, ज़ाहिर है, उस वक़्त की कल्पना करने की कोशिश करते हुए जब समूची धरती, या
उसका एक बड़ा हिस्सा पानी के नीचे था...मगर गेन्नादी ने ही अपनी इस टिप्पणी से
उत्पन्न सम्मानजनक ख़ामोशी को ये कहते हुए तोड़ा:
“और, चीड़ के पेड़ों को यहाँ से ख़ुराक मिलती है,
ये मुश्किल ही लगता है.”
“क्यों?”
“उनकी जड़ें कमज़ोर
होती हैं. देखो, ये ज़मीन पे पड़ी रहती हैं, मकड़ी के पंजों की तरह.”
“ये दूसरी जड़े हैं,” अंकल वीत्या ने कहा, “सहारे
के लिए. और पानी और भोजन दूसरी जड़ें सोखती हैं.”
“कौन सी?”
अंकल वीत्या
ने, समझाने के लिए अपने आप को तैयार करते हुए, गहरी साँस ली.
“ क्या कभी
मुड़े हुए चीड़ देखे हैं?”
“वो कहाँ से देखेगा?” झेन्का ग्लूखिख ठहाका
मारते हुए हँसने लगा. “उसे बेल्ट से ट्रैक्टर से बांध दो, वो झटका लगाता है और चल
पड़ता है!”
“नहीं, देखा है, देखा है,” त्यौरियाँ चढ़ाते हुए
गेन्नादी ने बात काटी. “तो क्या?”
“वहाँ, नीचे
है, तने के नीचे, पूँछ जैसी, मगर छोटी सी. ऐसी – तिकोने जैसी. जैसे नोकदार कील
होती है.”
“हुँ.”
“उसमें से पतली पतली जड़ें निकलती हैं धमनियों
जैसी. वो गहराई तक जाती हैं. इसलिए चीड़ों को रेत पर बढ़ना अच्छा लगता है – गर्माहट
भी रहती है, और जड़ें भी गहराई में होती हैं...”
“भाषण देना अच्छा लगता है. हाथ दो,” बूढ़े
मेर्ज़्ल्याकोव के छोटे बेटे दिमित्री मेर्ज़्ल्याकोव ने गढ़े से पुकारा, जो ख़ुद भी
बस दादा होने ही वाला था – बेटी ने पिछले साल नौ क्लास पास कर लिए थे और
क्रास्नोयार्स्क चली गई थी, वहाँ कॉलेज में दाख़िला ले लिया, और इन गर्मियों में,
जब छुट्टियों में आई थी, तो बता दिया कि उसे एक नौजवान मिल गया है, और उसने शादी
का प्रस्ताव भी रखा है.
“क्या, तेरे बदले मैं आऊँ?” ब्र्युखानोव ने
फ़ावड़ा उठाया.
“आ जा. वहाँ ठण्ड है, स्वेटर के भीतर से भी ठण्ड
घुस रही थी.”
सारे मर्द
हँसने लगे:
“मेर्ज़्ल्याक3 है ही ठिठुरने वाला...”
अंकल वीत्या ने
क़ब्र में झाँका :
“बस, काफ़ी है. दो मीटर के क़रीब है...तली को समतल
कर दे और – सब ठीक है. हमारे पास और भी काम है.” – और उसने कैनवास के एक बदरंग बैग
से, जिसे मछलियाँ पकड़ने के लिए साथ में ले जाते हैं, वोद्का की बोतल निकाली.
“ऐह, अंकल वीत्या, तू तो हमारा!...” ग्लूखिख जोश
से चिल्लाया, मगर अंकल वीत्या ‘हमारा’ कौन है, ये बताने के लिए शब्द नहीं ढूँढ़
पाया, बस चुटकी बजा दी.
“अरे, वो अकेला ही नहीं,” मेर्ज़्ल्याकोव ने
स्वेटर के नीचे कहीं से एक चपटा फ्लास्क निकाला. – “केद्रोव्का!”
गेन्नादी ने आह
भरी:
“तुम भी ना, यारों, अपने आपको बेवकूफ़ समझने पर
मजबूर करते हो. ख़ुद तो ले आए, और हम, मुफ़्तख़ोरों की तरह...इस बारे में सोचा ही
नहीं.”
“कोई बात नहीं, ये काफ़ी है. हम नशा थोड़े ही कर
रहे हैं. बस, उनकी याद में...”
लेशा
ब्र्युखानोव को बाहर आने में मदद की गई, औज़ार से चिपकी हुई मिट्टी साफ़ कर दी गई,
गड्ढे से थोड़ी दूर एक समतल जगह मिल गई. घेरा बना कर बैठ गए. अंकल वीत्या के थैले
में स्टील के तीन ग्लास मिल गए, कुछ छोटी-छोटी, पिचकी हुई नमकीन ककड़ियाँ, आधी डबल
रोटी, चर्बी के क्यूब्स... सब उसके और मेर्ज़्ल्याकोव के आभारी थे कि समय से पहले
अपनी बोतल नहीं निकाली. और अब, काम पूरा होने के बाद, हल्की सी थकावट महसूस करते
हुए घूँट-घूँट करके सौ ग्राम्स पीना, खाना, बतियाना...
“किससे शुरू करें?” झेन्का ग्लूखिख ने हाथ मलते
हुए पूछा.
“बेहतर है ‘नीट’ से. केद्रोवा – बाद में – स्वीट
डिश की तरह.”
“डा--लो!”
ग्लासों में
वोद्का डालते हुए कुछ परेशानी हुई.
सही कहें तो,
एक अनिवार्य बहस हुई:
“नीचे रख, पेंदे से न पकड़.”
“कैसे रखूँ? लुढ़क जाएगा.”
“नीचे रख और पकड़. पेंदे से पकड़ के कभी नहीं
डालना चाहिए.”
“अफ़ानासी इवानिच, तू तो अभी बुढ़ाया नहीं है, मगर
तेरे लक्षण कैसे हैं...”
“वोद्का के साथ इज़्ज़त से पेश आना चाहिए – ये कोई
बहता हुआ पानी थोड़े ही है. ये हमें सज़ा भी दे सकती है.” “
“ये सही है,” अंकल वीत्या ने गहरी साँस ली, “ये
बिल्कुल सही है. कित्तों को इसने यहाँ सुला दिया...सिर्फ, मेरी बात सुनो, पीने के
बाद गाँव में छुपते न फ़िरना, जिससे ढूँढ़ने की नौबत आए. ठीक है? कल शाम को तो होगा
ही, मगर आज – ऐसा नहीं करेंगे.”
जवाब में कुछ
आहत सुर में चिल्लाए – जैसे, पता है; हम कोई शराबी थोड़े ही हैं, जिसे बताने की
ज़रूरत हो...ग्लूखिख ने व्यंग्य से ऐसा ही कहा:
“पता है, टीचर कहीं का, - ये बात भी पढ़ानी पड़ती
है.”
“झेन्क, अगर मैं सचमुच का टीचर होता, तो मैं
तुझे ऐसा चाँटा मारता, कि महीना भर पेट में अपनी ज़बान ढूँढ़ता रहता.”
“तूने मारा ही था मुझे.”
“तेरी तो, गोल आरी में ऊँग़लियाँ घुसेड़ना चाहिए!”
“वैसे, अंकल वीत्या, स्कूल का क्या?”
ब्र्युखानोव ने पूछा. “मेरी नास्त्का कहती है कि इस साल ज्योग्राफ़ी और केमिस्ट्री के टीचर्स नहीं हैं. वैसे, कहती
है, कि कभी भी बन्द कर सकते हैं. लाइब्रेरी में आधी किताबें बांध के रखी हैं –
देते नहीं हैं.”
“हूँ, कभी भी नहीं. आख़िर तक पढ़ाते रहेंगे. और
टीचर्स – भाग गए.”
“हाँ-आ...” ब्र्युखानोव ने गिलास उठाया. “तो,
नतालिया सेर्गेयेव्ना की याद में पिएँ. अच्छी थी, ख़तरनाक नहीं थी...”
“हो सकता है, वो बिल्कुल सही समय पर चली गई,”
मेर्ज़्ल्याकोव ने टिप्पणी की.
अफ़ानासी इवानोविच
ने अपनी सफ़ेद भौंहे उठाईं, जिन पर पसीना छलक आया था:
“मतलब?”
“यहीं पड़ी रहेगी, मातृभूमि में...”-
“वो कुताय की है – राजधानी वाली,” मर्दों में से
सबसे बूढ़े, ख़ामोश-तबियत, इग्नाती अन्द्रेयेविच उलाएव ने कहा. उसकी त्यौरियाँ हमेशा
चढ़ी रहती थीं, मगर वो मेहनती और मितव्ययी था. उसे पीठ के पीछे सब लोग ‘हथौड़ा’ कहते
थे: हमेशा फ़ेन्सिंग में कुछ न कुछ सुधारता ही रहता था, हथौड़े से ठोंकता रहता,
ठोंकता रहता, दुकान से बैग्स भर-भरके कीलें घसीटा करता था.
“क्या फ़रक पड़ता है... धरती तो एक ही है. मगर,
हमें न जाने क़िस्मत कहाँ ले जाए...”
सबको अटपटा,
असहज महसूस हुआ. एक दूसरे की ओर नहीं देख रहे थे – कोई क़ब्रों की ओर, कोई चीड़ों के
चटख़-भूरे तनों की ओर, कोई नीचे, काँटों की ओर, जिन पर आलसी, उनींदी चींटियाँ रेंग
रही थीं. .. मेर्ज़्ल्याकोव के शब्दों ने कभी सुनाए गए हुक्म के भय से रूह का संरक्षण
करने वाला कवच उतार फेंका: “ज़रूरी सामान इकट्ठा कर लो! एक हफ़्ते बाद गाड़ी आएगी. जो
हुक्म नहीं मानेगा – उसे बल प्रयोग से भगा दिया जाएगा”.
यहाँ बैठे
लोगों में से किसी ने अभी तक ऐसी कोई घोषणाएँ नहीं सुनी थीं, मगर ज़्यादातर के
बाप-दादाओं और परदादाओं ने – सुनी थीं. किसी ने स्तलीपिन के ज़माने में, किसी ने
स्टालिन के ज़माने में. और उन्हें यक़ीन था कि देर-सबेर उनके लिए भी ऐसी घोषणाएँ की
जाएँगी.
तीस साल पहले
हुई तो थी. मगर आख़िरी पल में हुक्म देने वाले की आवाज़ टूट गई. उनके गाँव की दो और
पीढ़ियों ने जन्म लिया: कोल्या क्रिकाऊ की पीढ़ी और उन लोगों की पीढ़ी, जो आजकल स्कूल
में आधे टीचर्स के बिना पढ़ाई कर रहे हैं, स्थानांतरित होने के तैयार स्कूल के
सामान को बक्सों और डिब्बों में समेटा हुआ देख रहे हैं. स्थानांतरण वाली घोषणा का
सभी लोग इंतज़ार कर रहे थे, और अगर उन्होंने अब तक अपना सामान समेटा नहीं है, तो ये
ज़रूर तय कर लिया है कि क्या साथ में ले जाना है, और क्या फेंकना है. हर रोज़ इसी
ख़याल से दुखी होते थे, मगर चुपचाप, बग़ैर बहस किए. सुबह आँगन में निकलते, चारों ओर
नज़र दौड़ाते, दिमाग़ घूमने लगता: क्या ले जाएँ? कैसे चुनें? छत के नीचे खड़े होकर कोई
व्यवस्था करने का निश्चय करते हो, और सिर घूमने लगता है – इत्ती सारी ज़रूरत की,
मगर अब बेकार हो चुकी, परेशान करने वाली चीज़ें हैं. फेंकने में दुख होता है, और इस
पर्याप्तता में, उस सबमें जो बाप-दादाओं ने कोठरियों में, खत्तियों में, टॉवर्स
में जमा करके रखा है, जैसे डूब जाओगे...
थूक देते, न
सोचने की कोशिश करते. मगर यदि कोई स्थानांतरण के बारे में एक लब्ज़ भी निकालता, तो डर
उछल कर बाहर आ जाता, बढ़ता जाता, अपनी लपेट में ले लेता...
पहले उनमें से
तीन ने वोद्का पी ली. लालची न दिखाई देने के डर से, झेंपते हुए धीरे-धीरे, खाते
रहे. इसके बाद और तीन ने ख़त्म की. फिर - दो ने.
वे ख़ामोश थे, महसूस
कर रहे थे कि पेट में गिरकर वोद्का जिस्म में कैसे दौड़ने लगती है - गरम-गरम
चिंगारियों जैसी. साँस लेना आसान हो गया था, ख़ून में ताज़गी दौड़ गई...ये पहुँची
चिनगारियाँ सिर तक, भड़कीं, वहाँ, दिमाग़ में मौजूद किसी महत्वपूर्ण चीज़ को प्रकाशित
करते हुए, और बुझ गईं. और कुछ पलों तक चलने वाला नशा नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के, अपने
जिस्म के तीव्र एहसास की एक अजीब सी हालत ग़ायब हो गई. ख़ून फिर से धीरे-धीरे और
तनाव से बहने लगा, सीना फिर से निकोटिन की नमी से भर गया, दिमाग़ की कोई महत्वपूर्ण
चीज़ सांझ के झुरमुटे में छुप गई, और दुबारा पीने को – अपने भीतर एक और पैग डाल
लेने को जी चाहने लगा.
मगर किसी ने भी
बोतल की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया – उन्हें मालूम था कि इसके लिए ये समय उचित नहीं है:
अगर ‘पहले और दूसरे...’ के बीच मन मर्ज़ी करने लगो, तो फिर बहक जाओगे और बड़ी देर तक
रुक न पाओगे, वोद्का की मिन्नत कर-करके, माँग कर-करके आस पास के लोगों को भी
परेशान करोगे, और ख़ुद भी बेज़ार हो जाओगे. वे सिगरेट के कश लगाते रहे, इंतज़ार करते
रहे, कि पहले कौन बोलेगा. ‘पहला’ बनने की इच्छा नहीं हो रही थी, मगर ख़ामोश रहना भी
बोझिल लग रहा था.
“प्रकृति का कोई नियम है,” झेन्का ग्लूख़िख़ ने
कहा. “मैंने ग़ौर किया है...”
“अरे, मैंने भी ग़ौर किया है,” मुस्कुराते हुए
ब्र्युखानोव ने उसकी बात काटी. “गर्मियों
के बाद – पतझड़, पतझड़ के बाद – सर्दियाँ.”
“ज़रा ठहर, मैं उस बारे में नहीं कह रहा हूँ!
मैंने ग़ौर किया है कि, स्वयम् प्रकृति ही इन्सान को मृत्यु के लिए तैयार करती
है...”
अफ़ानासी
इवानोविच ने, जो अभी तक इस ख़याल से दूर नहीं हुआ था, कि नतालिया सेर्गेयेव्ना सही
समय पर चली गई, फिर से त्यौरी चढ़ा ली:
“किस लिहाज़ से – तैयार करती है?”
“अच्छा, याद है...तुझे, अफ़ोन, अंकल वीत्या,
इग्नात, याद है, कि नाता आण्टी कैसी ऊँची, हट्टी कट्टी थी. है ना?”
“तो. फिर क्या?”
“और वो कितनी दुबली हो गई, पूरी की पूरी सिकुड़
गई. वैसे बीमार तो नहीं थी, मगर कैसे... मुश्किल से ही कभी भूखी रही होगी...ये
प्रकृति ही उसे तैयार कर रही थी, जिससे कि आसानी से ताबूत में समा सके.”
कुछ लोग
अविश्वास से खँखारे, बाकी के मुस्कुराए. सिर्फ अंकल वीत्या ने सिर हिलाया:
“हाँ, सही है, सही
है...”
“और कई बूढ़े, जैसे –
पिघलते हैं, सूखने लगते हैं...”
“अफ़सोस है, कि अपने
पलंग पे नहीं मरी,” सूखी टहनी के टुकड़े करते हुए मोलोतोचेक ने गहरी साँस ली.
“ओह, नहीं, मरी तो
अपनी ही कॉट पे. उसे होश भी आया था, कहते हैं, कि कुछ कहने की कोशिश भी की थी.”
“मेरी कॉटेज में
अभी तक मौत वाली कॉट पड़ी है,” अफ़ानासी इवानोविच ने कहा. “दद्दू उस पे गुज़र गए...एक
बार लेटे और: “बस, अब नहीं उठूँगा”. दादी, अम्मा उन्हें शर्मिन्दा करने लगीं, पाप
से डराने लगीं, मगर वो : “बकवास न करो, ज़िन्दगी के रास्ते से बिदा लेने दो”. और
रात में – सब ख़तम...दादी को अपनी मौत में यक़ीन नहीं था, जिले में ले जाने को कहा –
अस्पताल में, और एक हफ़्ते बाद उसे वापस लाए, शौहर की बगल में...”
“मगर सभी तो उस तरह नहीं मरते हैं, जैसे झेन्का ने
बताया...मतलब, तैयार होकर,” ट्रैक्टर-ड्राइवर गेन्नादी को याद आया. “ये...माफ़
करना, दिमोन,” वो मेर्ज़्ल्याकोव की तरफ़ मुड़कर बोला, “तेरे चाचा, मिखाइल पेत्रोविच,
सत्तर साल से ऊपर ही जिए, और वैसे ही, पहाड़ की तरह, रहे. जब ताबूत खींच रहे थे, तो
लोगों की पीठ टूटते-टूटते बची. ‘ज़ापोरोझ्ये’ के थे...”
“होता-आ है,”
झेन्का ने गहरी साँस ली. “वो ज़िन्दगी भर हट्टेकट्टे रहे, मरे भी हट्टेकट्टे ही.
मुझे याद है, किसी गेट के पास बैठे रहते, एकदम सूखे- जर्जर, मगर फिर भी पता चलता
था, कि उनमें ताक़त है...हाँ, होता है...और जो समय से पहले मर गए, या जिन्हें मार
डाला गया, उनके बारे में मैं नहीं कह रहा हूँ.”
“हाँ, बात समझ में
आ रही है,” अंकल वीत्या ने कहा. “प्राकृतिक रूप से मरना, ये भी सीखना चाहिए. जैसे
कैन्सर – किसी किसी को महिने भर में खा जाता है, कुछ लोग सालों दर्द से चिल्लाते
रहते हैं...”
“हम, न जाने क्यों,
निराशा के गर्त में जा रहे हैं,” अफ़ानासी इवानोविच काँपने लगा. “चलो, एक-एक घूँट
और हो जाए.”
“जैसा माहौल होगा,
वैसी ही बातें होती हैं,” झेन्का ने ज़िद्दी कँटीली घास पर गिलास जमाते हुए कहा.
अंकल वीत्या सावधानी से गिलासों में वोद्का डालने लगा.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें