रविवार, 24 अप्रैल 2016

Zona - 01

वलेंतीन ग्रिगोरेविच रास्पूतिन को
समर्पित

अध्याय – एक

एक फ़ोन-कॉल


 “हैलो, वोलोद्, क्या पाँच मिनट दे सकते हो?”
 “हाँ, दे सकता हूँ...क्या हो गया?”
 “कुछ नहीं-कुछ नहीं, सब ठीक है...दिमाग़ में एक छोटा सा आइडिया आया है.”
 “तोल्या, तेरे आइडियाज़ से मेरे बदन में सिहरन दौड़ने लगती है...”
 “नहीं, कोई ख़तरनाक बात नहीं है. मैं क्रास्नोयार्स्क की तरफ़ से गुज़र रहा था, और वहाँ, पता चला, कि एक ‘गेस’ (हाइड्रो इलेक्ट्रिक पॉवर स्टेशन का संक्षिप्त रूप – अनु.) है – अधूरा ...”
 “हुँ, अगर मैं ग़लत नहीं हूँ, तो हमारे यहाँ दस से ज़्यादा ऐसे ‘गेस’ हैं.
 “तो, बात ये है, कि ये क़रीब-क़रीब तैयार है. साठ प्रतिशत. नौवें दशक के शुरू में इसे छोड़ दिया था. डैम लगभग तैयार है, मशीनों वाले हॉल्स...मतलब, ठीक ठाक करने में कुछ ज़्यादा नहीं लगेगा.”
 “मैं जानता हूँ, तेरा कुछ नहीं लगेगा.”
 “नहीं, नहीं, वोलोद्, इस बार सचमुच में! इन्वेस्ट तो करना पड़ेगा, मगर इतना भी नहीं, कि...”
 “मगर किसलिए? क्या हमारे यहाँ बिजली की कमी है? तूने ख़ुद ही तो क्षमता के बारे में रिपोर्ट दी थी...”
 “ ये तो निर्भर करता है, वोलोद्... जैसे, अगर इश्तेहारों को और क्रिसमस ट्रीज़ को सजाना हो, तो – हाँ. मगर... बिजली बेची भी तो जा सकती है...विदेशी पार्टनर्स को. यहाँ, चीन है पास में, मुझे यक़ीन है कि उन्हें दिलचस्पी होगी.”
 “चीनी ख़ुद ही पचासों पॉवर स्टेशन्स बना रहे हैं.”
 “कोई बात नहीं, वे काफ़ी नहीं होंगे...एल्युमिनियम का कारख़ाना लगाएँगे. एल्युमिनियम की ज़रूरत हर जगह होती है...”
 “तुझे तो सिर्फ बिज़नेस करना है.”
 “हूँ, बगैर इसके तो काम नहीं चलेगा – मार्केट. ख़ास बात ये नहीं है, वोलोद्.”
 “तो फिर क्या है?”
 तुम समझते हो ना, वोलोद्, कि नए ‘गेस’ का आरंभ, वो भी शक्तिशाली, महत्वपूर्ण जगह पे स्थित ‘गेस’ का – ये प्रेस्टिज बढ़ाने वाली बात है! देख, कितने सालों तक हम सोवियत-धरोहर को बर्बाद करते रहे, चूसते रहे, मगर अब आख़िरकार निर्माण में लग गए. ख़ुद ही, ख़ुद अपने ही हाथों से!...और वो भी कैसे?”
 “पता नहीं...बेशक, अकलमन्दी से...”
 “वो ही तो! तोल्या कभी बुरी सलाह नहीं देगा.”
 “क्या बात है...”
 “तो, प्रस्ताव स्वीकार है?”
 “हुँ, ऐसे सवाल इस तरह से नहीं सुलझाए जाते. टेलिफ़ोन पे नहीं...”
 “क्यों नहीं? बल्कि टेलिफ़ोन पे ही सुलझाए जाते हैं. टेलिफ़ोन का आविष्कार इसीलिए किया गया है... वर्ना तो एनिसेई के किनारे से र्ऑर्डर आने में एक महीना लग जाएगा...चल, वोलोद्या, ऐसा करते हैं: मैं प्रस्ताव भेजता हूँ, तू बाद में नज़र डाल ले...”
 “कैसा प्रस्ताव?”
 “ कुछ इस तरह का, क्रास्नोयार्स्क विभाग की सामाजिक-आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक उपायों के बारे में. प्रमुख बिन्दु बनाएँगे ‘गेस’ के शुभारंभ को, एल्युमिनियम प्लान्ट के निर्माण को. कहेंगे कि इससे विकास को बहुत बढ़ावा मिलेगा...लोगों को काम देंगे. उनकी ओर देखना बड़ा भयानक है. सिर्फ बकवास करते रहते हैं...”
 “और जगह कौन सी लोगे? क्या कोई जातीय प्रदेश नज़र में है?”
 “नहीं-नहीं, रूसी!”
 “चलो, कम से कम ये तो ठीक है. वर्ना, तो बदबू रोक न पाओगे: रेन्डियर पालन बर्बाद कर देंगे, पारंपरिक जीवन-शैली बिगाड़ देंगे...”
 “ये तुम पेट्रोल वालों का कारनामा है. मेरा तो सब कुछ साफ़-सुथरा है : इलेक्ट्रिक पॉवर. डैम, तालाब -  और पैसा कमाने भेज दो...”
 “क्या कहने...और क्या, किसी को विस्थापित करना पड़ेगा?”
 “मतलब?”
“मतलब – तालाब. इन तालाबों को मैं स्विट्ज़रलैण्ड के ज़माने से जानता हूँ.”
 “वहाँ तो अस्सी के दशक में ही सबको विस्थापित कर दिया गया था. कोई पाँच हज़ार बचे हैं. समाज से छिटके हुए और पेन्शनधारी. कुछ कॉलोनियाँ भी हैं – जलाशयों के तहत आने वाले क्षेत्र को तैयार करने के लिए वहाँ किसी समय ख़ास तौर से लोगों को बसाया गया था.”
 “फिर क्या. तैयार हो गया?”
 “हाँ, कह तो रहा हूँ: क़रीब-क़रीब सब कुछ तैयार है. मैं आधा-अधूरा प्रस्ताव लेकर तुम्हारे पास आता ही नहीं...चल, वोलोद्, हरी झण्डी दिखा.”
 “और ये बात मन में कौन लाएगा?”
 “मतलब, पूंजी?”
 “और क्या?...” 
 “कुछ तो मेरी ऑर्गेनाइज़ेशन1 दे देगी, कुछ, मैं सोचता हूँ, अल्योझ्का पे डाल देंगे.”    
 “कौन से अल्योझ्का पे?”
 “अरे, बन्यास्का पे. उसे तो हमारा एल्युमिनियम किंग बनाया गया है. अभी और एल्युमिनियम चाहता है – तो, करे इन्वेस्ट.”
“गड़बड़ करेगा. उसके लिए तो फ़िलहाल जितने हैं, उतने ही कारख़ाने बस हैं.”
 “आगे बढ़ने की संभावना से कोई इनकार नहीं करता. फिर उस पर दबाव भी डाला जा सकता है. तेरे पास तो उसके बारे में काफ़ी माल-मसाला है. अगर नहीं चाहेगा – तो या तो यूरोप जाकर आराम करे, या फिर ट्रान्स-बायकाल में कहीं जाकर मोज़े बनाता रहे. ऐसे उदाहरण तो हैं.”
 “मेरे पास तो सबके ख़िलाफ़ माल-मसाला है...”
 “हाँ, समझता हूँ, समझता हूँ. वैसे, मेरे पास भी है...मगर अच्छे संदर्भ में...फिर अलेझेक ने हाल ही में मुझे धोखा दिया है, उसे फ़िट करना ज़रूरी है.”            
 और, क्या ‘गेस’ का निर्माण करने के अपने साधन तुम्हारे पास हैं?”
 “पूरा करने के, वोलोद्, पू-रा-करने-के. सब लोग सिर्फ ख़ुश ही होंगे. मज़ाक नहीं!...और पैसों का इंतज़ाम भी कर लेंगे...”         
“हाँ, सरकारी बजट में. या स्थिरीकरण-कोश में. अल्योशा ग़ुस्से से पागल हो जाएगा.”
 “ग्यारण्टी, वहाँ नहीं जाएँगे. हद से हद अंग्रेज़ी कानून का प्रयोग करेंगे...”
 “ये और क्या बला है?”
 “अरे, समझाने में बहुत समय लगेगा...एक मुश्किल आर्थिक-शब्द है...”
 “बस-बस, हो गई शुरूआत.”
 “नहीं, वोलोद्, ऐसी कोई बात नहीं है, जैसा कि साइबेरिया में कहते हैं. सब कुछ मार्केट-एकोनोमी की सीमा में होगा... हैलो?”
 “सोच रहा हूँ...अंत में ये ‘गेस’ होगा किसका?”
 “हमारे यहाँ सब कुछ किसका होता है, वोलोद्? सब ठीक ठाक होगा. मिखाइल इवानिच को भी नहीं भूलेंगे.”
 “मगर-मगर!”
 “और फिर, हम सब इन्सान हैं, वोलोद्. इन्सानियत वाली कोई भी बात हमारे लिए अनजान नहीं रहनी चाहिए... मगर सबसे पहले सार्वजनिक कार्य के बारे में सोचना चाहिए. आख़िर हम रूस को वैश्विक परिदृश्य में स्थापित करना चाहते हैं.”
 “ओह, बस कर...वैसे तो, बेशक, अगर तेरी बात पे यक़ीन करूँ तो प्रस्ताव दिलचस्प है.”
 “दिलचस्प भी है, और फ़ायदेमन्द भी. सबसे पहले तो, वोलोद्, तेरे ही लिए फ़ायदेमन्द है. रूस के इतिहास में तेरा नाम लिखा जाएगा...हैलो, वोलोद्... कहाँ खो गया?”
 “फ़िर क्या, कोशिश कर सकते हैं.”
  “तेरी डिक्शनरी से ‘कोशिश करना’ ये शब्द ग़ायब हो जाना चाहिए. ज़्यादा दमदार होना चाहिए. ‘फ़ैसला करना’, ‘पूरा करना’, ‘मूर्त रूप देना’!
 “बस-बस, अब रुक भी जा. वैसे भी सिर सूज गया है.”
“तो, मैं डिक्री लिखता हूँ, और तू बन्यास्का को तैयार कर. वो भी शामिल हो जाए.”
 “शायद, सलाह-मशविरा करना, विषेषज्ञों को इकट्ठा करना अच्छा रहेगा?”       
 “क्या कह रहा है?! सलाह-मशविरे वाली सोवियत सरकार दस साल पहले ख़त्म हो गई, और तू अभी भी – “सलाह-मशविरे” की रट लगा रहा है. अब ये भी कह दे, कि पोलिटब्यूरो की मीटिंग करना पड़ेगी. काम करना चाहिए, वोलोद्, न कि सलाह-मशविरा...तूने काम के लिए रूस को हाथों के बल खड़ा कर दिया.”
 “तोल्या, तेरी बकबक सुनते-सुनते मैं थक गया. चल, ‘गुड लक’ कहता हूँ और – रखता हूँ.”

 “थैंक्यू! अगले फ़ोन तक, बाय!”

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